श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
लोकांश्च लोकानुगतान् पशूंश्च
हित्वा श्रितास्ते चरणातपत्रम् ।
परस्परं त्वद्गुणवादसीधु-
पीयूषनिर्यापितदेहधर्मा: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
लोकान्—सांसारिक कार्यकलाप; च—तथा; लोक-अनुगतान्—सांसारिकता का अनुसरण करने वाले; पशून्— पशुवत्; च—तथा; हित्वा—त्याग कर; श्रिता:—शरणागत; ते—तुम्हारे; चरण—चरणकमलों का; आतपत्रम्— छत्र; परस्परम्—एक दूसरे से; त्वत्—तुम्हारा; गुण—गुणों का; वाद—तर्क-वितर्क द्वारा; सीधु—मादक; पीयूष— अमृत से; निर्यापित—बुझाया गया; देह-धर्मा:—शरीर की मूल आवश्यकताएँ ।.
 
अनुवाद
 
 फिर भी जिन पुरुषों ने रूढ़ सांसारिकता तथा इनके पशुतुल्य अनुयायियों का परित्याग कर दिया है और जिन्होंने परस्पर विचार-विनिमय के द्वारा आपके गुणों तथा कार्यकलापों के मादक अमृत (सुधा) का पान करके आपके चरण-कमलों की छत्र छाया ग्रहण की है वे भौतिक देह की मूल आवश्यकताओं से मुक्त हो सकते हैं।
 
तात्पर्य
 कर्दम मुनि विवाहित जीवन की आवश्यकता का वर्णन करने के बाद इस बात पर बल देते हैं कि जो लोग भौतिक इन्द्रिय-सुख में लिप्त रहते हैं उनके लिए विवाह तथा अन्य सामाजिक कार्य रूढ़ (घिसे-पिटे) नियम हैं। पशु जीवन के नियम—खाना, सोना, मैथुन तथा रक्षा करना—वास्तव में शरीर की आवश्यकताएँ हैं, किन्तु जो पुरुष इस भौतिक जगत के इन रूढ़ कार्य-कलापों को त्यागकर दिव्य कृष्णभक्ति में अपने को लगाता है, वह सामाजिक रूढिय़ों से छूट जाता है। बद्धजीव तो माया या शाश्वत काल—भूत, वर्तमान तथा भविष्य—के वश में रहता है, किन्तु ज्योंही वह कृष्णभक्ति में अपने को लगाता है त्योंही वह भूत-भविष्य तथा वर्तमान की सीमाओं को लाँघकर आत्मा के शाश्वत कार्य-कलापों में स्थित हो जाता है। भौतिक जीवन के सुखों व भोग के लिए मनुष्य को वैदिक आदेशों के अनुसार चलना होता है, किन्तु जिन्होंने भगवान् की भक्ति करनी स्वीकार कर ली है वे इस भौतिक जगत के किसी प्रकार के विधि-विधान से भयभीत नहीं होते। ऐसे भक्त भौतिक कार्यकलापों की रूढिय़ों की परवाह नहीं करते; वे निर्भीक होकर उस शरण को ग्रहण करते हैं, जो जन्म-मरण के चक्र रूपी धूप के लिये छाते का काम करती है।

भौतिक अस्तित्व में एक शरीर से दूसरे शरीर में आत्मा का निरन्तर स्थानान्तरण ही दुख का कारण है। बद्ध जीवन का यह भौतिक अस्तित्व ही संसार कहलाता है। कोई व्यक्ति अच्छा कार्य करके अत्यन्त सुन्दर भौतिक परिस्थिति में जन्म ग्रहण कर सकता है, किन्तु जिस प्रक्रम के अनुसार जन्म तथा मृत्यु होती है, वह भीषण अग्नि के समान है। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने गुरु की प्रार्थना में इसका वर्णन किया है। संसार अर्थात् जन्म-मरण का चक्र वन की अग्नि के सदृश है, वन की अग्नि लकडिय़ों के घर्षण से स्वत: लगती है, किसी को प्रयास नहीं करना पड़ता और उसे न तो कोई दयावान पुरुष, न ही अग्नि-विभाग बुझा सकता है। वह तो तभी बुझ सकती है जब बादलों से मूसलाधार वर्षा हो। बादल की उपमा गुरु की कृपा से दी गई है। गुरु की कृपा से भगवान् का अनुग्रह रूपी बादल लाया जाता है तभी कृष्णभक्ति की वर्षा होने पर संसार की अग्नि बुझाई जा सकती है। इसकी भी यहाँ व्याख्या की गई है। भौतिक संसार के रूढ़ बद्धजीवन से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को भगवान् के चरणकमलों की शरण उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार निर्विशेषवादी ग्रहण करते हैं, वरन् भगवान् का जप और उनके कार्यकलापों का श्रवण करते हुए भक्तिमय सेवा में ग्रहण करनी चाहिए। तभी सांसारिक कर्मों एवं बन्धनों से मुक्त हुआ जा सकता है। यहाँ पर यह संस्तुति की गई है कि मनुष्य को चाहिए कि वह इस संसार के बद्धजीवन और तथाकथित सभ्य पुरुषों की संगति का परित्याग कर दे जो शिष्ट रूप में केवल खाने, सोने, संभोग करने तथा रक्षा करने का वही घिसापिटा जीवन बिता रहे हैं। भगवान् की महिमा का कीर्तन तथा श्रवण यहाँ पर त्वद्- गुण-वाद-सीधु के रूप में वर्णित है। भगवान् की लीलाओं का कीर्तन तथा श्रवण रूपी अमृत का पान करके ही मनुष्य इस संसार की मादकता को भूल सकता है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥