श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
नैतद्बताधीश पदं तवेप्सितं
यन्मायया नस्तनुषे भूतसूक्ष्मम् ।
अनुग्रहायास्त्वपि यर्ही मायया
लसत्तुलस्या भगवान् विलक्षित: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; एतत्—यह; बत—निस्सन्देह; अधीश—हे भगवान्; पदम्—भौतिक संसार; तव—तुम्हारी; ईप्सितम्— इच्छा; यत्—जो; मायया—आपकी बहिरंगा शक्ति से; न:—हमारे लिए; तनुषे—प्रकट होते हो; भूत-सूक्ष्मम्—स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्व; अनुग्रहाय—अनुग्रह करने के लिए; अस्तु—हो; अपि—भी; यर्हि—जब; मायया—आपकी अहैतुकी कृपा से; लसत्—भव्य; तुलस्या—तुलसी दल की माला से; भगवान्—श्रीभगवान्; विलक्षित:—देखा जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, इच्छा के न होते हुए भी आप स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्वों की इस सृष्टि को हमारी ऐन्द्रिय तुष्टि के लिए प्रकट करते हैं। आपकी अहैतुकी कृपा हमें प्राप्त हो, क्योंकि आप अपने नित्य रूप में तुलसीदल की माला से विभूषित होकर हमारे समक्ष प्रकट हुए हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ यह स्पष्ट उल्लेख है कि भौतिक जगत की सृष्टि परमेश्वर की निजी इच्छा से नहीं वरन् उनकी बहिरंगा शक्ति के द्वारा होती है, क्योंकि जीवात्माएँ उसका उपभोग करना चाहती हैं। यह संसार उन लोगों के लिए नहीं बनाया गया जो इन्द्रिय-तृप्ति का सुख नहीं उठाना चाहते, जो निरन्तर दिव्य प्रेमाभक्ति में व्यस्त रहते हैं और जो नित्य कृष्णभावना भावित रहते हैं। उनके लिए तो आध्यात्मिक जगत निरन्तर विद्यमान है, जिसे वे भोग सकते हैं। श्रीमद् भागवत में अन्यत्र कहा गया है कि जिन लोगों ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली है उनके लिए यह संसार व्यर्थ है। चूँकि यह संसार पद-पद में संकट से पूर्ण है, अत: यह भक्तों के निमित्त न होकर उन जीवात्माओं के लिए है, जो अपने जोखिम पर भौतिक शक्ति को वश में रखना चाहते हैं। श्रीकृष्ण इतने दयालु हैं कि इन्द्रिय-सुख चाहने वालों के लिए उन्होंने पृथक् जगत की सृष्टि की है, जिसे वे अपनी इच्छानुसार भोग सकें; फिर भी वे अपने सगुण रूप में प्रकट होते हैं। भगवान् अनिच्छापूर्वक इस भौतिक संसार की सृष्टि करते हैं, किन्तु वे या तो स्वयं साकार होकर अवतरित होते हैं या अपने किसी विश्वासपात्र पुत्र या सेवक या फिर वेदव्यास जैसे विश्वसनीय लेखक को उपदेश देने के लिए भेजते हैं। वे भगवद्गीता के प्रवचनों के रूप में स्वयं उपदेश देते हैं। सृष्टि के साथ-साथ यह प्रचार कार्य भी चलता रहता है, जिससे इस संसार में सड़ रही पथभ्रष्ट जीवात्माएँ भगवान् के धाम पहुँच कर उनकी शरण ग्रहण कर लें। इसीलिए भगवद्गीता का अन्तिम उपदेश है, “इस संसार के सारे बनावटी कार्यों को त्यागकर मेरी शरण में आओ। मैं समस्त पापमय कर्मफलों से तुम्हें बचा लूँगा।”
 
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