श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
विदित्वा तव चैत्यं मे पुरैव समयोजि तत् ।
यदर्थमात्मनियमैस्त्वयैवाहं समर्चित: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—परमेश्वर से कहा; विदित्वा—जानकर; तव—तुम्हारी; चैत्यम्—मानसिक स्थिति; मे—मेरे द्वारा; पुरा—इसके पूर्व ही; एव—निश्चय ही; समयोजि—योजना की गई; तत्—वह; यत्-अर्थम्—जिसके लिए; आत्म— मन तथा इन्द्रियों का; नियमै:—संयम या अनुशासन से; त्वया—तुम्हारे द्वारा; एव—केवल; अहम्—मैं; समर्चित:— पूजित हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा—जिसके लिए तुमने आत्मा संयमादि के द्वारा मेरी आराधना की है, तुम्हारे मन के उस भाव को पहले ही जानकर मैंने उसकी व्यवस्था कर दी है।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सबों के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं, अत: वे प्रत्येक व्यक्ति के भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जानने के साथ ही उसकी इच्छाओं, कार्यों तथा उसके विषय में सब कुछ जानते हैं। भगवद्गीता में कहा गया है कि वे हृदय में साक्षीस्वरूप स्थित हैं। भगवान् कर्दम मुनि के हृदय की अभिलाषा को जान गये और उसकी पूर्ति के लिए उन्होंने पहले ही व्यवस्था कर दी थी। वे एकनिष्ठ भक्त को, चाहे वह जो कुछ भी चाहे, निराश नहीं करते, किन्तु उसकी भक्ति के मार्ग में किसी प्रकार की बाधा आने नहीं देते।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥