श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
प्रजापतिसुत: सम्राण्मनुर्विख्यातमङ्गल: ।
ब्रह्मावर्तं योऽधिवसन् शास्ति सप्तार्णवां महीम् ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रजापति-सुत:—भगवान् ब्रह्मा का पुत्र; सम्राट्—महान् राजा; मनु:—स्वायंभुव मनु; विख्यात—सुप्रसिद्ध; मङ्गल:— जिसके शुभ कार्य; ब्रह्मावर्तम्—ब्रह्मावर्त; य:—जो; अधिवसन्—रहते हुए; शास्ति—शासन करता है; सप्त—सात; अर्णवाम्—समुद्र; महीम्—पृथ्वी ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ब्रह्मा के पुत्र सम्राट स्वायंभुव मनु जो अपने सुकृत्यों के लिए विख्यात हैं, ब्रह्मावर्त में स्थित होकर सात समुद्रों वाली पृथ्वी पर शासन करते हैं।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी ऐसा कहा जाता है कि ब्रह्मावर्त कुरुक्षेत्र का एक अंग है या कि कुरुक्षेत्र स्वयं ब्रह्मावर्त में स्थित है, क्योंकि देवताओं को कुरुक्षेत्र में दैवी कर्मकाण्ड सम्पन्न करने की संस्तुति की जाती है। कुछ अन्य लोगों का मत है कि ब्रह्मावर्त ब्रह्मलोक का एक स्थान है जहाँ स्वायंभुव शासन करते थे। इस पृथ्वी पर ऐसे अनेक स्थान हैं, जो उच्चलोक में भी जाने जाते हैं। उदाहरणार्थ, इस लोक में वृन्दावन, द्वारका तथा मथुरा जैसे स्थान हैं, किन्तु ये शाश्वत रूप में कृष्णलोक में भी स्थित हैं। पृथ्वी पर ऐसे ही अनेक नाम हैं और सम्भव है कि जैसे यहाँ कहा गया है वराह युग में स्वयांभुव मनु ने इस लोक पर भी शासन किया हो। मंगल: शब्द भी महत्त्वपूर्ण है। मंगल का अर्थ है, वह जो सभी प्रकार से धार्मिक अनुष्ठानों, शासन शक्ति, स्वच्छता तथा अन्य गुणों के ऐश्वर्य से सम्पन्न हो। विख्यात का अर्थ है सुप्रसिद्ध। स्वायंभुव मनु इन सभी के ऐश्वर्य से सद्गुणों तथा वैभवों के लिए सुप्रसिद्ध थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥