श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
आत्मजामसितापाङ्गीं वय:शीलगुणान्विताम् ।
मृगयन्तीं पतिं दास्यत्यनुरूपाय ते प्रभो ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
आत्म-जाम्—अपनी पुत्री; असित—श्याम; अपाङ्गीम्—आँखें; वय:—तरुण आयु; शील—आचरण से; गुण— अच्छे गुणों से; अन्विताम्—युक्त; मृगयन्तीम्—खोजती हुई; पतिम्—पति को; दास्यति—दे देंगे; अनुरूपाय— अनुरूप, उपयुक्त; ते—तुमको; प्रभो—महोदय! ।.
 
अनुवाद
 
 उनके एक श्याम नेत्रों वाली तरुणी कन्या है। वह विवाह के योग्य है, वह उत्तम आचरण वाली तथा सर्व गुणसम्पन्न है। वह भी अच्छे पति की तलाश में है। महाशय, उसके माता-पिता तुम्हें देखने आएँगे। तुम उसके सर्वथा अनुरूप हो जिससे वे अपनी कन्या को तुम्हारी पत्नी के रूप में अर्पित कर देंगे।
 
तात्पर्य
 अच्छी कन्या के लिए अच्छे वर का चुनाव सदैव माता पिता करते रहे हैं। यहाँ यह स्पष्ट उल्लेख है कि मनु तथा उनकी पत्नी अपनी कन्या को प्रदान करने के लिए कर्दम मुनि को देखने जा रहे थे, क्योंकि उनकी कन्या योग्य थी और वे समान गुण वाले वर की तलाश में थे। यही माता-पिता का कर्तव्य है। लड़कियों को कभी सडक़ पर निकल कर पति की तलाश करने की आज्ञा नहीं दी जाती, क्योंकि युवती होकर यदि वे पति की तलाश करें तो वे भूल जाएँगी कि पति उनके अनुरूप भी है या नहीं। काम-पिपासा के कारण वे किसी को भी पति बना सकती हैं, किन्तु यदि माता-पिता उसके पति का चुनाव करते हैं, तो विचार कर सकते है कि किसे चुना जाय और किसे नहीं। फलत: वैदिक पद्धति में माता-पिता अनुरूप वर को कन्या का दान करते हैं, उसे स्वतन्त्र रूप से वर चुनने की आज्ञा नहीं दी जाती।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥