श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
तस्य वै दुहिता ब्रह्मन्देवहूतीति विश्रुता ।
पत्नी प्रजापतेरुक्ता कर्दमस्य त्वयानघ ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उस मनु की; वै—निस्सन्देह; दुहिता—पुत्री; ब्रह्मन्—हे पवित्र ब्राह्मण; देवहूति—देवहूति नामक; इति—इस प्रकार; विश्रुता—प्रसिद्ध थी; पत्नी—सहधर्मिणी; प्रजापते:—उत्पन्न जीवों के स्वामी की; उक्ता—कहा गया; कर्दमस्य—कर्दम मुनि का; त्वया—तुम्हारे द्वारा; अनघ—हे पापविहीन पुरुष ।.
 
अनुवाद
 
 हे पवित्र ब्राह्मण, हे पापविहीन पुरुष, आपने उनकी पुत्री के विषय में कहा है कि वे प्रजापति ऋषि कर्दम की पत्नी देवहूति थीं।
 
तात्पर्य
 यहाँ हम स्वायम्भुव मनु के विषय में चर्चां कर रहे हैं; किन्तु भगवद्गीता में वैवस्वत मनु का वर्णन है। आधुनिक युग वैवस्वत मनु से सम्बन्धित है। स्वायंभुव मनु इसके पूर्व राज्य कर रहे थे और उनका इतिहास वराह युग से अर्थात् जब
भगवान् शूकर रूप में प्रकट हुए तब से प्रारम्भ होता है। ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं और प्रत्येक मनु के जीवन काल में कुछ विशिष्ट घटनाएँ घटती हैं। भगवद्गीता का वैवस्वत मनु स्वायंभुव मनु से सर्वथा भिन्न है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥