श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 45-47
 
 
श्लोक
प्रविश्य तत्तीर्थवरमादिराज: सहात्मज: ।
ददर्श मुनिमासीनं तस्मिन् हुतहुताशनम् ॥ ४५ ॥
विद्योतमानं वपुषा तपस्युग्रयुजा चिरम् ।
नातिक्षामं भगवत: स्‍निग्धापाङ्गावलोकनात् ।
त द्वय‍हृतामृतकलापीयूषश्रवणेन च ॥ ४६ ॥
प्रांशुं पद्मपलाशाक्षं जटिलं चीरवाससम् ।
उपसंश्रित्य मलिनं यथार्हणमसंस्कृतम् ॥ ४७ ॥
 
शब्दार्थ
प्रविश्य—प्रवेश करने पर; तत्—उस; तीर्थ-वरम्—पवित्र स्थलों में श्रेष्ठ; आदि-राज:—प्रथम राजा (स्वायंभुव मनु); सह-आत्मज:—अपनी पुत्री के समेत; ददर्श—देखा; मुनिम्—मुनि को; आसीनम्—बैठे हुए; तस्मिन्—उस आश्रम में; हुत—आहुति करते हुए; हुत-अशनम्—पवित्र अग्नि; विद्योतमानम्—परम ज्योतिमान; वपुषा—अपने शरीर से; तपसि—तपस्या में; उग्र—कठिन; युजा—योग में लगे; चिरम्—दीर्घकाल से; न—नहीं; अतिक्षामम्— अत्यन्त दुर्बल; भगवत:—भगवान् की; स्निग्ध—स्नेहिल; अपाङ्ग—तिरछी; अवलोकनात्—चितवन से; तत्— उसका; व्याहृत—शब्दों से; अमृत-कला—चन्द्रमा के समान; पीयूष—अमृत; श्रवणेन—सुनकर; च—तथा; प्रांशुम्—लम्बा; पद्म—कमल-पुष्प; पलाश—पंखुड़ी; अक्षम्—आँखें; जटिलम्—जुड़ा; चीर-वाससम्—चिथड़े वस्त्र धारण किये; उपसंश्रित्य—निकट जाकर; मलिनम्—मलिन, गंदा; यथा—जिस प्रकार; अर्हणम्—मणि; असंस्कृतम्—बिना तराशा हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 उस पवित्र स्थान में आदि राजा स्वयांभुव मनु अपनी पुत्री सहित प्रविष्ट हुए और उन्होंने जाकर देखा कि अभी-अभी पवित्र अग्नि में आहुति देकर वे मुनि अपने आश्रम में आसन लगाए थे। उनका शरीर अत्यन्त आभावान था। यद्यपि वे दीर्घ काल तक कठोर तपस्या में लगे हुए थे, किन्तु वे तनिक भी क्षीण नहीं थे, क्योंकि भगवान् ने उन पर कृपा-कटाक्ष किया था और उन्होंने भगवान् के चन्द्रमा के समान स्निग्ध अमृतमय शब्दों का पान किया था। मुनि लम्बे थे, उनकी आँखें बड़ी-बड़ी थीं मानो कमल-दल हों और उनके सिर पर जटा-जूट था। वे चिथड़े पहने थे। स्वायंभुव मनु उनके पास गये और उन्होंने देखा कि वे धूलधूसरित हैं मानो बिना तराशा हुआ कोई मणि हो।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर एक ब्रह्मचारी योगी का कुछ-कुछ वर्णन हुआ है। आत्मिक उन्नति के इच्छुक ब्रह्मचारी का प्रथम कर्तव्य है कि प्रात:काल हुत-हुतासन करे अर्थात् यज्ञ करके परमेश्वर को आहुति प्रदान करे। ब्रह्मचर्य की साधना करने वाले कभी भी प्रात:काल सात या नौ बजे तक सोते नहीं रहते। उन्हें सूर्योदय के पूर्व, कम से कम डेढ़ घंटा पहले उठ जाना चाहिए और आहुति देनी चाहिए अथवा इस युग में वे भगवान् श्रीकृष्ण के पवित्र नाम, हरे कृष्ण का जप कर सकते हैं। जैसाकि भगवान् चैतन्य ने कहा है—कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा—अर्थात् इस कलियुग में भगवान् के पवित्र नाम के जप के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं और कोई विकल्प नहीं और कोई विकल्प नहीं है। ब्रह्मचारी को प्रात:काल जल्दी उठना चाहिए और सुस्थिर होकर भगवन्नाम का जप करना चाहिए। उस मुनि की आकृति से ही ऐसा लग रहा था कि उसने कठिन तप किया है और ब्रह्मचर्य पालन का यही लक्षण भी है। यदि कोई भिन्न प्रकार से रहता है, तो उसके मुख तथा शरीर में दिखने वाले काम-भाव से यह पता लग जाएगा। विद्योतमानम् शब्द बताता है कि उसके शरीर में ब्रह्मचारी के लक्षण दिखाई पड़ रहे थे। योग में कठिन तपस्या करने का यही सबसे बड़ा प्रमाण है। शराबी, धूम्रपान करने वाला या इन्द्रियलोलुप व्यक्ति कभी भी योग साधना
के लिए उपयुक्त नहीं होता। सामान्य रूप से योगी अत्यन्त दुर्बल दिखते हैं, क्योंकि वे सुविधा सम्पन्न स्थिति में नहीं रहते, किन्तु कर्दम मुनि दुर्बल नहीं थे, क्योंकि उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साक्षात् दर्शन हुए थे। यहाँ पर स्निग्धापाङ्गावलोकनात् का अर्थ है कि उन्हें भगवान् का साक्षात् दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वे स्वस्थ लग रहे थे, क्योंकि उन्होंने भगवान् के कमल- अधरों से निस्सृत अमृतमय शब्दों का सीधे पान किया था। इसी प्रकार जो भगवान् के पवित्र नाम, ‘हरे कृष्ण’ की दिव्य ध्वनि को सुनता है उसका स्वास्थ्य सुधर जाता है। हमने वास्तव में देखा है कि अनेक ब्रह्मचारी तथा गृहस्थ, जो अन्तर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ से जुड़े हैं उनका स्वास्थ्य सुधर गया है और उनके मुखमंडल पर कान्ति आ गई है। जो ब्रह्मचारी आत्मिक उन्नति में लगा रहता है उसके लिए आवश्यक है कि वह अत्यन्त स्वस्थ और तेजवान दिखे। एक मुनि और बिना तराशे गये मणि की तुलना भी अत्यन्त उपयुक्त है। भले ही खान से निकला हुआ मणि बिना पालिश के हो, किन्तु उसकी आभा को कोई रोक नहीं सकता। इसी प्रकार भले ही कर्दम मुनि ने अच्छे वस्त्र धारण नहीं किये थे और उनका शरीर उचित रूप से भी स्वच्छ नहीं था, किन्तु कुल मिलाकर उनकी सूरत मणि तुल्य थी।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥