श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक
योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् ।
रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लाय ते नम: ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; अर्क—सूर्य का; इन्दु—चन्द्रमा का; अग्नि—अग्नि, अग्निदेव का; इन्द्र—स्वर्ग के स्वामी, इन्द्र का; वायूनाम्—वायु का; यम—यम का; धर्म—धर्म; प्रचेतसाम्—तथा वरुण का; रूपाणि—रूप; स्थाने— आवश्यकतानुसार; आधत्से—धारण करते हो; तस्मै—उसे; शुक्लाय—भगवान् विष्णु को; ते—तुमको; नम:— नमस्कार ।.
 
अनुवाद
 
 जब भी आवश्यक होता है, आप सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम, धर्म, वरुण का अंश धारण करते हैं। आप भगवान् विष्णु के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हैं, अत: आपको सभी प्रकार से नमस्कार है।
 
तात्पर्य
 चूँकि कर्दम मुनि ब्राह्मण थे और स्वायंभुव क्षत्रिय थे, अत: सामाजिक रूप से मुनि के द्वारा राजा को नमस्कार नहीं किया जाना था, क्योंकि उसका स्थान राजा से ऊँचा था। किन्तु मुनि ने स्वायंभुव मनु को नमस्कार किया, क्योंकि राजा तथा सम्राट के रूप में मनु भगवान् के प्रतिनिधि थे। परम प्रभु भगवान् सदैव सबों के पूज्य हैं चाहे कोई ब्राह्मण हो, क्षत्रिय या शूद्र। भगवान् के प्रतिनिधि रूप में राजा हर एक से सादर नमस्कार किये जाने का पात्र था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥