श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 21: मनु-कर्दम संवाद  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक
तत: समाधियुक्तेन क्रियायोगेन कर्दम: ।
सम्प्रपेदे हरिं भक्त्या प्रपन्नवरदाशुषम् ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
तत:—तब, उस तप में; समाधि-युक्तेन—समाधि अवस्था में; क्रिया-योगेन—भक्तियोग अथवा पूजा से; कर्दम:— कर्दम मुनि ने; सम्प्रपेदे—सेवा की; हरिम्—श्रीभगवान् की; भक्त्या—भक्तिपूर्वक; प्रपन्न—शरणागत जीवों को; वरदाशुषम्—समस्त वरों के प्रदाता ।.
 
अनुवाद
 
 समाधिकाल में कर्दम मुनि ने समाधि में अपनी भक्ति द्वारा शरणागतों को तुरंत समस्त वर देने वाले श्रीभगवान् की आराधना की।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर ध्यान की महत्ता का वर्णन है। कर्दम मुनि ने परम पुरुषोत्तम भगवान् हरि को प्रसन्न करने के लिए दस हजार वर्षों तक योग-ध्यान का अभ्यास किया। अत: कोई चाहे योग का अभ्यास करे या चिन्तन करे और ईश्वर की खोज करे, इन प्रयासों में भक्ति की प्रक्रिया मिश्रित की जानी चाहिए। बिना भक्ति के कुछ भी पूर्ण नहीं। सिद्धि तथा साक्षात्कार का लक्ष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। भगवद्गीता के छठे अध्याय में यह स्पष्ट उल्लेख है कि जो कृष्णभावनामृत में निरन्तर संलग्न रहता है, वह सर्वोच्च योगी है। श्रीभगवान् हरि अपने शरणागत भक्तों की समस्त इच्छाओं को भी पूरा करते हैं। वास्तविक सफलता प्राप्त करने के लिए मनुष्य को श्रीभगवान् हरि या श्रीकृष्ण के चरणकमलों में समर्पण करना होता है। भक्ति अथवा कृष्णभावनामृत में लगे रहना प्रत्यक्ष विधि है और अन्य सभी विधियाँ संस्तुत किए जाने के बावजूद भी अप्रत्यक्ष हैं। इस कलिकाल में प्रत्यक्ष विधि अप्रत्यक्ष विधि से अधिक सहज है, क्योंकि मनुष्यों का जीवन-काल कम होता है, उनकी बुद्धि कमजोर है, वे गरीब हैं और अनेक कठिनाइयों से ग्रस्त रहते हैं। अत: भगवान् चैतन्य ने जो सबसे बड़ा वरदान दिया, वह यह है कि अध्यात्मिक जीवन में सिद्धि प्राप्त करने के लिए ईश्वर के पवित्र नाम का कीर्तन ही पर्याप्त है।

सम्प्रपेदे हरिम् शब्दों का अर्थ है कि कर्दम मुनि ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि को अपनी भक्ति से अनके प्रकार से प्रसन्न किया। भक्ति को क्रिया-योगेन शब्द से भी व्यक्त किया गया है। कर्दम मुनि न केवल ध्यान करते थे, वरन् भक्ति में भी संलग्न रहते थे। चाहे योग हो या ध्यान मनुष्य को सिद्धि के लिए श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि के द्वारा भक्ति करनी होती है। स्मरण करना भी ध्यान है। किन्तु स्मरण किसका किया जाय? मनुष्य को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का स्मरण करना चाहिए। न केवल श्रीभगवान् का स्मरण करना चाहिए, वरन् भगवान् के कार्यों का श्रवण और उनकी महिमा का कीर्तन भी करना चाहिए। यह जानकारी प्रामाणिक धर्मग्रन्थों में मिलती है। दस हजार वर्षों तक विभिन्न प्रकार की भक्ति मय सेवा करने के बाद कर्दम मुनि को ध्यान में सिद्धि प्राप्त हुई, किन्तु इस कलियुग में ऐसा कर पाना सम्भव नहीं, क्योंकि मनुष्य अधिक से अधिक एक सौ वर्ष जीवित रह पाता है। इस समय ऐसा कौन होगा जो योग के अनेकानेक विधि-विधानों का कड़ाई से पालन कर सके? साथ ही, सिद्धि उन्हें ही प्राप्त होती है, जो समर्पित आत्माएँ हैं। जहाँ श्रीभगवान् के नाम का उल्लेख तक न हो वहाँ आत्मसमर्पण कैसा? और जहाँ श्रीभगवान् के नाम का ध्यान तक न हो वहाँ योग कैसा? दुर्भाग्यवश इस युग में, विशेषतया जो आसुरी प्रवृत्ति के लोग हैं, वे ठगे जाने में विश्वास करते हैं। अत: भगवान् ऐसे वंचकों (धोखा देने वालों) को भेजते हैं, जो उन्हें योग के नाम पर गुमराह करते हैं और उनके जीवन को निकम्मा बना देते हैं। अत: भगवद्गीता (१६.१७) में स्पष्ट उल्लेख है कि चालबाज लोग अवैध धन को संचित करके गर्व से फूल जाते हैं और किसी प्रामाणिक ग्रंथ का अनुसरण किये बिना योग का अभ्यास करते हैं। उन्हें इस धन का घमंड हो जाता है, जिसे उन्होंने निर्दोष व्यक्तियों से लूटा-खसोटा है और जो स्वयं धोखा खाना चाहते हैं।

 
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