श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
तत्प्रतीच्छ द्विजाग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया ।
सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—अत:; प्रतीच्छ—कृपया स्वीकार करें; द्विज-अछय—हे ब्राह्मणश्रेष्ठ; इमाम्—इसको; श्रद्धया—श्रद्धा से; उपहृताम्—भेंट स्वरूप प्रदत्त; मया—मेरे द्वारा; सर्व-आत्मना—सब प्रकार से; अनुरूपाम्—उपयुक्त; ते—तुम्हारे लिए; गृह-मेधिषु—गृहस्थी में; कर्मसु—कर्म, कर्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 अत: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आप इसे स्वीकार करें, क्योंकि मैं इसे श्रद्धापूर्वक अर्पित कर रहा हूँ। यह सभी प्रकार से आपकी पत्नी होने और आपकी गृहस्थी के कार्यों को चलाने में सर्वथा योग्य है।
 
तात्पर्य
 गृहमेधिषु कर्मसु शब्दों का अर्थ है “गृहस्थोचित कार्यों में।” यहाँ एक अन्य शब्द भी प्रयुक्त हुआ है—सर्वात्मनानुरूपाम्। इसका सारांश यह है कि पत्नी को आयु, चरित्र तथा गुणों में न केवल पति के समान होना चाहिए किन्तु गृहस्थी के कार्यों में भी सहायक होना चाहिए। मनुष्य का गृहस्थोचित कार्य केवल इन्द्रियतृप्ति ही नहीं वरन् पत्नी, सन्तानों के साथ रहते हुए आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करना है। जो ऐसा नहीं करता वह गृहस्थ नहीं वरन् गृहमेधी है। संस्कृत साहित्य में दो शब्द प्रयुक्त मिलते हैं—एक है गृहस्थ और दूसरा गृहमेधी है। गृहस्थ एक आश्रम भी है, किन्तु यदि कोई गृहस्थ होकर केवल इन्द्रियों की तुष्टि करता है, तो वह गृहमेधी है। गृहमेधी के लिए पत्नी बनाने का अर्थ इन्द्रियों की तुष्टि करना है, किन्तु गृहस्थ के लिए योग्य पत्नी आध्यात्मिक कार्यों में उन्नति के लिए सब प्रकार से सहायक के रूप में होती है। पत्नी का कर्तव्य है कि वह गृहस्थी के सारे कार्यों को सँभाले, न कि पति से स्पर्धा करे। पत्नी सहायता करने के निमित्त होती है, किन्तु वह अपने पति की तब तक सहायता नहीं कर सकती जब तक वह आयु, शील तथा गुण में उसके समान न हो।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥