श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
य उद्यतमनाद‍ृत्य कीनाशमभियाचते ।
क्षीयते तद्यश: स्फीतं मानश्चावज्ञया हत: ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; उद्यतम्—भेंट; अनादृत्य—अनादर करके; कीनाशम्—कंजूस से; अभियाचते—याचना करता है; क्षीयते—नष्ट होता है; तत्—उसका; यश:—कीर्ति; स्फीतम्—विस्तीर्ण; मान:—सम्मान; च—तथा; अवज्ञया— अवमानना से; हत:—नष्ट ।.
 
अनुवाद
 
 जो स्वत: प्राप्त भेंट का पहले अनादर करता है और बाद में कंजूस से वर माँगता है, वह अपने विस्तीर्ण यश को खो देता है और अन्यों द्वारा अवमानना से उसका मान भंग होता है।
 
तात्पर्य
 वैदिक ब्याह की सामान्य विधि में पिता अपनी कन्या उपयुक्त वर को सुपुर्द करता है। यही अत्यन्त सम्माननीय विवाह है। वर कन्या के पिता के यहाँ जाकर विवाह की याचना करने नहीं जाना चाहिए। इससे उसके सम्मान को धक्का लगता है। मुनि उपयुक्त कन्या से विवाह करना चाहते थे और स्वायंभुव मनु कर्दम मुनि को आश्वस्त कर देना चाहते थे, “मैं आपको ऐसी ही पत्नी दे रहा हूँ। उसे अस्वीकार न करें, अन्यथा आपको किसी अन्य से याचना करनी पड़ेगी, क्योंकि आपको उसकी आवश्यकता है और हो सकता है कि वह आपके साथ भद्र व्यवहार न करे। तब आपका मान भंग हो सकता है।”

इस घटना की दूसरी विशेषता यह है कि स्वायंभुव मनु सम्राट होकर भी अपनी योग्य कन्या एक निर्धन ब्राह्मण को भेंट करने गये थे। कर्दम मुनि के कोई गृहस्थी न थी, वे जंगल में कुटी में रह रहे थे, किन्तु सुसंस्कृत थे। अत: किसी व्यक्ति को अपनी कन्या प्रदान करते समय सम्पत्ति या अन्य सांसारिक बातों पर ध्यान न देकर संस्कृति तथा गुण को वरीयता प्रदान की जाती है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥