श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
ऋषिरुवाच
बाढमुद्वोढुकामोऽहमप्रत्ता च तवात्मजा ।
आवयोरनुरूपोऽसावाद्यो वैवाहिको विधि: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषि:—परम साधु कर्दम ने; उवाच—कहा; बाढम्—एवमस्तु; उद्वोढु-काम:—विवाह का इच्छुक; अहम्—मैं; अप्रत्ता—अन्य किसी से वचनबद्ध न होना; च—तथा; तव—तुम्हारी; आत्म-जा—पुत्री; आवयो:—हम दोनों का; अनुरूप:—उपयुक्त; असौ—यह; आद्य:—प्रथम; वैवाहिक:—विवाह का; विधि:—अनुष्ठान ।.
 
अनुवाद
 
 महामुनि ने उत्तर दिया—निस्सन्देह मैं विवाह का इच्छुक हूँ और आपकी कन्या ने न किसी से विवाह किया है और न ही किसी दूसरे को वचन दिया है। अत: वैदिक पद्धति के अनुसार हम दोनों का विवाह हो सकता है।
 
तात्पर्य
 स्वायंभुव मनु की कन्या को स्वीकार करने के पूर्व कर्दम मुनि के समक्ष विचारणीय बातें अनेक थीं। प्रथम तो यह कि देवहूति ने उन्हीं के साथ विवाह करने का निश्चय कर रखा था। वह अन्य किसी को अपना पति बनाना नहीं चाह रही थी। यह सबसे बड़ी विचारणीय बात थी, क्योंकि जब कोई स्त्री प्रथम दर्शन पर ही किसी पुरुष को अपना मन अर्पित कर देती है, तो उसे वापस लेना कठिन होता है। यही स्त्रियों का मनोविज्ञान है। साथ ही इसके पूर्व उसका विवाह भी नहीं हुआ था; वह कुँवारी थी। इन सब बातों से कर्दम मुनि ने उसे स्वीकार कर लिया। अत: उन्होंने कहा, “हाँ, विवाह के धार्मिक नियमों के अनुसार मुझे आपकी कन्या स्वीकार है।” विवाह के भी कई प्रकार हैं। उत्तम ब्याह वह है, जिसमें उपयुक्त वर को बुलाकर कन्या को वस्त्रों तथा आभूषणों से सुसज्जित करके तथा पिता की सामर्थ्य के अनुसार दहेज देकर कन्या अर्पित की जाती है। विवाह के अन्य प्रकार भी हैं यथा गंधर्व विवाह तथा प्रेम विवाह। इन्हें भी विवाह माना जाता है। यदि कोई कन्या बलपूर्वक हरी जाकर बाद में पत्नी रूप में स्वीकार कर ली जाती है, तो उसे भी विवाह मानते हैं। किन्तु कर्दम मुनि ने विवाह की उत्तम प्रणाली स्वीकार की, क्योंकि कन्या का पिता चाह रहा था और वह कन्या भी योग्य थी। उसने किसी अन्य के साथ प्रेम नहीं किया था। इन सब बातों से कर्दम मुनि को स्वायंभुव मनु की कन्या को ग्रहण करने के लिए राजी हुए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥