श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
काम: स भूयान्नरदेव तेऽस्या:
पुत्र्या: समाम्नायविधौ प्रतीत: ।
क एव ते तनयां नाद्रियेत
स्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम् ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
काम:—इच्छा; स:—वह; भूयात्—पूरी हो; नर-देव—हे राजा; ते—तुम्हारी; अस्या:—इस; पुत्र्या:—पुत्री का; समाम्नाय-विधौ—वेदोक्त विधि से; प्रतीत:—मान्य; क:—कौन; एव—निस्सन्देह; ते—तुम्हारी; तनयाम्—पुत्री को; न आद्रियेत—आदर (पूजा) नहीं करेगा; स्वया—अपने से; एव—अकेले; कान्त्या—देह की कान्ति (आभा); क्षिपतीम्—तिरस्कृत करती; इव—मानो; श्रियम्—आभूषण ।.
 
अनुवाद
 
 आप अपनी पुत्री की, वेदों द्वारा स्वीकृत विवाह-इच्छा की पूर्ति करें। उसको कौन नहीं ग्रहण करना चाहेगा? वह इतनी सुन्दर है कि उसकी शारीरिक कान्ति ही उसके आभूषणों की सुन्दरता को मात कर रही है।
 
तात्पर्य
 कर्दम मुनि देवहूति के साथ शास्त्रोक्त विधि से विवाह करना चाहते थे। वेदोक्त विधि के अनुसार सर्वोत्तम विधि यह है कि दुलहिन के घर दूल्हे को आमन्त्रित करके कन्या दान किया जाय और साथ में आभूषण, स्वर्ण, साज-सामान तथा अन्य गृहस्थी की वस्तुएँ दहेज रूप में दी जायें। आज भी उच्च वर्ग के हिन्दुओं में ब्याह का यह रूप प्रचलित है और शास्त्रों में इसे कन्या के पिता के लिए अत्यन्त धार्मिक कृत्य कहा गया है। उपयुक्त दामाद को अपनी पुत्री का दान करना (कन्यादान) गृहस्थ का पुण्य कार्य माना जाता है। मनुस्मृति में आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख है, किन्तु इनमें से अब केवल एक ही विवाह-विधि, ब्रह्म या राजसिक विवाह प्रचलित है। इस कलियुग में अन्य प्रकार के विवाह—यथा प्रेम द्वारा, जयमाला द्वारा, अपहरण द्वारा विवाह वर्जित हैं। पहले क्षत्रिय अपनी इच्छानुसार दूसरे राजपरिवार की राजकुमारी का अपहरण करते थे, फिर उस क्षत्रिय तथा कन्या के परिवार वालों के बीच युद्ध होता था और यदि अपहरणकर्ता विजयी होता था, तो उसे कन्या दे दी जाती थी। यहाँ तक कि श्रीकृष्ण ने इसी विधि से रुक्मिणी को ब्याहा था और उनके और उनके कुछ पुत्रों तथा पौत्रों ने भी ऐसा ही किया था। श्रीकृष्ण के पौत्र ने दुर्योधन की कन्या का अपहरण किया जिससे कौरवों तथा यादवों में युद्ध हुआ। बाद में कौरव वंश के गुरुजनों ने समझौता करा दिया। प्राचीनकाल में ऐसे विवाह प्रचलित थे, किन्तु आज के समय में क्षत्रिय जीवन के कठोर नियमों मे विघटन हो जाने से ऐसा होना दुष्कर है। चूँकि भारत विदेशों पर आश्रित रहने लगा, फलत: उसकी सामाजिक व्यवस्था छिन्न हो गई और शास्त्रों के अनुसार अब सभी लोग शूद्र हैं। तथाकथित ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों ने अपने पारम्परिक कृत्यों का परित्याग कर दिया है, फलत: वे शूद्र बन चुके हैं। शास्त्रों का कथन है—कलौ शूद्र संभव:—इस कलिकाल में सभी शूद्र के समान हैं। इस युग में सनातन सामाजिक रीति-रिवाजों का पालन नहीं किया जा रहा यद्यपि पिछले समय में उनका कड़ाई से पालन होता था।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥