श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
यां हर्म्यपृष्ठे क्‍वणदङ्‌घ्रिशोभां
विक्रीडतीं कन्दुकविह्वलाक्षीम् ।
विश्‍वावसुर्न्यपतत्स्वाद्विमाना-
द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेता: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
याम्—जिसको; हर्म्य-पृष्ठे—राज प्रासाद की छत पर; क्वणत्-अङ्घ्रि-शोभाम्—उसके चरणों के नूपरों की ध्वनि से जिसकी सुन्दरता बढ़ी हुई हैं; विक्रीडतीम्—खेलती हुई; कन्दुक-विह्वल-अक्षीम्—मोहित नेत्रों से अपनी गेंद का पीछा करती; विश्वावसु:—विश्वावसु; न्यपतत्—गिर पड़ा; स्वात्—स्वत:; विमानात्—विमान से; विलोक्य—देखकर; सम्मोह-विमूढ-चेता:—जिसका मन सम्मोहित था ।.
 
अनुवाद
 
 मैंने सुना है कि आपकी कन्या को महल की छत पर गेंद खेलते हुए देखकर महान् गन्धर्व विश्वावसु मोहवश अपने विमान से गिर पड़ा, क्योंकि वह अपने नूपुरों की ध्वनि तथा चञ्चल नेत्रों के कारण अत्यन्त सुन्दरी लग रही थी।
 
तात्पर्य
 ऐसा लगता है कि आजकल की तरह उस समय भी गगनचुम्बी भवन होते थे। यहाँ पर हर्म्य-पृष्ठे शब्द आया है। हर्म्य का अर्थ है, “अत्यन्त विशाल महल।” स्वाद् विमानात् का अर्थ है, “अपने विमान से।” इससे लगता है कि उन दिनों में भी व्यक्तिगत विमान या हेलीकाप्टर होते थे। आकाश में उड़ते हुए गंधर्व विश्वावसु ने देवहूति को अपने महल की छत पर गेंद खेलते देखा। उस काल में गेंद खेलना भी प्रचलित था, किन्तु राजपरिवारों की लड़कियाँ सार्वजनिक स्थान में नहीं खेलती थीं। गेंद खेलना तथा अन्य आमोद-प्रमोद सामान्य स्त्रियों तथा लड़कियों के लिए नहीं थे, ऐसे खेल केवल देवहूति जैसी राजकुमारियाँ ही खेल सकती थीं। यहाँ यह बताया गया है कि उड़ते विमान से उसे देखा गया। इससे सूचित होता है कि वह महल बहुत ऊँचा था, अन्यथा वह विमान से कैसे देखी जा सकती थी? यह दृश्य इतना स्पष्ट था कि गंधर्व विश्वावसु उसकी सुन्दरता को देखकर तथा उसके नूपुरों की ध्वनि सुनकर सुन्दरता एवं ध्वनि से इतना आकर्षित हुआ कि मोहग्रस्त होकर गिर पड़ा। कर्दम मुनि ने इस घटना को जिस रूप में सुन रखा था, उसका वर्णन कर दिया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥