श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
मनुरुवाच
ब्रह्मासृजत्स्वमुखतो युष्मानात्मपरीप्सया ।
छन्दोमयस्तपोविद्यायोगयुक्तानलम्पटान् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
मनु:—मनु ने; उवाच—कहा; ब्रह्मा—ब्रह्माजी ने; असृजत्—उत्पन्न किया; स्व-मुखत:—अपने मुख से; युष्मान्— आपको (ब्राह्मणों को); आत्म-परीप्सया—अपनी रक्षा के लिए विस्तार करके; छन्द:-मय:—वेदरूप; तप:-विद्या योग-युक्तान्—तप, ज्ञान तथा योग से युक्त; अलम्पटान्—इन्द्रिय-तृप्ति से विमुख ।.
 
अनुवाद
 
 मनु ने कहा—वेदस्वरूप ब्रह्मा ने वैदिक ज्ञान के विस्तार हेतु अपने मुख से आप जैसे ब्राह्मणों को उत्पन्न किया है, जो तप, ज्ञान तथा योग से युक्त और इन्द्रियतृप्ति से विमुख हैं।
 
तात्पर्य
 वेदों का उद्देश्य परम सत्य के दिव्य ज्ञान का प्रसार है। बाह्मणों की उत्पत्ति परम पुरुष के मुख से हुई, फलत: उनका कार्य वेद-ज्ञान का प्रसार करना है, जिससे भगवान् की महिमा का प्रसार हो। भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण कहते हैं कि समस्त वेद पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जानने के लिए हैं। यहाँ विशेष रूप से उल्लेख है (योगयुक्तानलम्पटान्) कि ब्राह्मण योगयुक्त होते हैं और इन्द्रिय-तृप्ति से अनासक्त। वास्तव में दो प्रकार की वृत्तियां होती हैं। एक तो इस भौतिक संसार में इन्द्रियों की तृप्ति और दूसरी वृत्ति आध्यात्मिक अर्थात् ईश्वर का गुणगान करके उन्हें प्रसन्न करना। जो इन्द्रिय-तृप्ति में लगे रहते हैं, वे असुर कहलाते हैं और जो भगवान् के यश को फैलाते हैं या भगवान् की दिव्य इन्द्रियों की तृप्ति करते हैं, वे देवता कहे जाते हैं। यहाँ इसका विशेष रुप से उल्लेख हुआ है कि ब्राह्मण उस विराट पुरुष के मुख से उत्पन्न हुए; इसी प्रकार क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनके कटि भाग से तथा शूद्र उनके पाँवों से उत्पन्न बताये गये हैं। ब्राह्मण तप, विद्या तथा ज्ञान के निमित्त उत्पन्न किये गये। वे समस्त प्रकार के विषय-भोगों से अनासक्त रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥