श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
स उग्रधन्वन्नियदेवाबभाषे
आसीच्च तूष्णीमरविन्दनाभम् ।
धियोपगृह्णन् स्मितशोभितेन
मुखेन चेतो लुलुभे देवहूत्या: ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय:—ऋषि मैत्रेय ने; उवाच—कहा; स:—वह (कर्दम); उग्र-धन्वन्—हे योद्धा विदुर; इयत्—इतना; एव—ही; आबभाषे—बोला; आसीत्—हो गया; च—यथा; तूष्णीम्—मौन; अरविन्द-नाभम्—भगवान् विष्णु (जिनकी नाभि कमल से भूषित है); धिया—विचार से; उपगृह्णन्—पकड़ते हुए; स्मित-शोभितेन—अपनी मुस्कान से सुशोभित; मुखेन—अपने मुखमण्डल से; चेत:—मन; लुलुभे—मोहित हो गया; देवहूत्या:—देवहूति के ।.
 
अनुवाद
 
 श्री मैत्रेय ने कहा—हे योद्धा विदुर, कर्दम मुनि ने केवल इतना ही कहा और कमलनाभ पूज्य भगवान् विष्णु का चिन्तन करते हुए वह मौन हो गये। वे उसी मौन में हँस पड़े जिससे उनके मुखमण्डल पर देवहूति आकृष्ट हो गई और वह मुनि का ध्यान करने लगी।
 
तात्पर्य
 ऐसा प्रतीत होता है कि कर्दम मुनि मौन होते ही कृष्णभावनामृत में लीन हो गये और भगवान् विष्णु का चिन्तन करने लगे। कृष्णभावनामृत (भक्ति) की यही विधि है। शुद्ध भक्त श्रीकृष्ण के चिन्तन में इतने लीन हो जाते हैं कि उनके कोई दूसरा कार्य ही नहीं रह जाता, भले ही ऊपर से वे कुछ करते दिखें, किन्तु वे मन में निरन्तर श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हैं। ऐसे कृष्ण-भक्त की हँसी इतनी आकर्षक होती है कि वह अपनी हँसी से न जाने कितने प्रशंसकों, शिष्यों तथा अनुयायियों के हृदयों को जीत लेता है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥