श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
प्रत्तां दुहितरं सम्राट् सद‍ृक्षाय गतव्यथ: ।
उपगुह्य च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मथिताशय: ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
प्रत्ताम्—दान दी गई; दुहितरम्—कन्या को; सम्राट्—राजा (मनु); सदृक्षाय—उपयुक्त व्यक्ति को; गत-व्यथ:—भार से मुक्त; उपगुह्य—चूमकर; च—तथा; बाहुभ्याम्—अपने दोनों हाथों से; औत्कण्ठ्य-उन्मथित-आशय:—अत्यन्त उत्सुक एवं क्षुब्ध मन ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार अपनी पुत्री को योग्य वर को प्रदान करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होकर स्वायंभुव मनु का मन वियोग के कारण विचलित हो उठा और उन्होंने अपनी प्यारी पुत्री को दोनों बाहों में भर लिया।
 
तात्पर्य
 पिता जब तक अपनी वयस्क पुत्री को किसी उपयुक्त वर को अर्पित नहीं कर देता तब तक वह चिन्ताग्रस्त रहता है। माता तथा पिता जब तक अपनी सन्तानों का विवाह नहीं कर लेते तब तक उनके ऊपर जिम्मेदारी बनी रहती है और जब पिता अपना कर्तव्य निबाह लेता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥