श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
बर्हिष्मतीं नाम विभुर्यां निर्विश्य समावसत् ।
तस्यां प्रविष्टो भवनं तापत्रयविनाशनम् ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
बर्हिष्मतीम्—बर्हिष्मती नगरी में; नाम—नामक; विभु:—परम शक्तिमान स्वायंभुव मनु; याम्—जिस; निर्विश्य— प्रवेश करके; समावसत्—पहले रहता था; तस्याम्—उस नगरी में; प्रविष्ट:—प्रवेश किया; भवनम्—महल; ताप- त्रय—तीन प्रकार के ताप; विनाशनम्—नष्ट करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 जिस बर्हिष्मती नगरी में मनु पहले से रहते थे उसमें प्रवेश करने के पश्चात् वे अपने महल में गये जो सांसारिक त्रय-तापों को नष्ट करने वाले वातावरण से परिव्याप्त था।
 
तात्पर्य
 यह भौतिक संसार तीन प्रकार के तापों—दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों से पूर्ण है। मानव समाज की सार्थकता इसीमें है कि कृष्णभावनामृत को प्रसारित करके आध्यात्मिक वातावरण उत्पन्न करे। इस संसार के तापों का कृष्णभावनामृत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इसका अर्थ यह नहीं है कि कृष्ण-भक्ति करने पर संसार के सभी ताप लुप्त हो जाते हैं, वरन् यह कि जो कृष्णभक्त होता है उस पर इन तापों का प्रभाव नहीं पड़ता। हम भौतिक वातावरण के तापों को रोक नहीं सकते, किन्तु कृष्णभावनामृत वह प्रतिरोधी ओषधि है, जो हमें इन तापों से बचाती है। कृष्णभक्त के लिए स्वर्ग तथा नरक का वास एकसमान है। अगले श्लोक में बताया गया है कि मनु ने वह वातावरण किस प्रकार उत्पन्न किया जिससे वे तीनों तापों से अप्रभावित रह आये।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥