श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम् ।
यदाभ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
निष्णातम्—लिप्त; योग-मायासु—क्षणिक सुख में; मुनिम्—मुनि तुल्य; स्वायम्भुवम्—स्वायंभुव; मनुम्—मनु को; यत्—जिससे; आभ्रंशयितुम्—विचलित होकर; भोगा:—सांसारिक सुख; न—नहीं; शेकु:—सक्षम थे; भगवत्- परम्—भगवान् का परम भक्त ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार स्वयंभुव मनु साधु-सदृश राजा थे। भौतिक सुख में लिप्त रहकर भी वे निम्नकोटि के जीवन की ओर आकृष्ट नहीं थे, क्योंकि वे निरन्तर कृष्णभावनामृत के वातावरण में भौतिक सुख का भोग कर रहे थे।
 
तात्पर्य
 राजसी सुख प्राप्त होने पर मनमानी इन्द्रिय-तृप्ति के कारण मनुष्य निम्नकोटि के जीवन—अर्थात् पशु जीवन की ओर बढ़ता है। किन्तु स्वायंभुव मनु तो साधु के समान थे, क्योंकि उनके राज्य तथा घर में कृष्णभावनामृत का वातावरण था। बद्धजीवों के साथ भी ऐसा ही है; वे इन्द्रियतृप्ति के लिए भौतिक शरीर धारण करते हैं, किन्तु यदि वे जैसा यहाँ पर बताया गया है या शास्त्रोक्त विधि से मन्दिर पूजा तथा घरेलू देव-पूजा के द्वारा कृष्णभावनामृत का वातावरण उत्पन्न कर सकते हैं, तो भौतिक सुख भोगते हुए भी वे शुद्ध कृष्णभक्ति में प्रगति कर सकते हैं। आज के समय में, आधुनिक सभ्यता इन्द्रियतृप्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त है। अत: कृष्णभावनामृत आन्दोलन मनुष्यों को भौतिक सुख भोगते हुए मानव जीवन का सदुपयोग करने का सुयोग प्रदान करता है। कृष्णभक्ति इन्हें भौतिक सुख के लिए वर्जित नहीं करती, वरन् इन्द्रियसुख सम्बन्धी आदतों को संयमित करती है। वे भौतिक लाभों को उठाते हुए इसी जीवन में कृष्णभक्ति का अभ्यास करते हुए भगवान् के पवित्र नाम—हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे, कीर्तन-जप—करते हुए मुक्त हो सकते हैं।
 
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