श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 22: कर्दममुनि तथा देवहूति का परिणय  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
स भवान्दुहितृस्‍नेहपरिक्लिष्टात्मनो मम ।
श्रोतुमर्हसि दीनस्य श्रावितं कृपया मुने ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
स:—आप; भवान्—आप; दुहितृ-स्नेह—अपनी पुत्री के स्नेहवश; परिक्लिष्ट-आत्मन:—क्षुब्ध मन वाला; मम— मेरा; श्रोतुम्—सुनने के लिए; अर्हसि—प्रसन्न हों; दीनस्य—मुझ दीन की; श्रावितम्—प्रार्थना को; कृपया— कृपापूर्वक; मुने—हे मुनि ।.
 
अनुवाद
 
 हे मुनि, कृपापूर्वक मुझ दीन की प्रार्थना सुनें, क्योंकि मेरा मन अपनी पुत्री के स्नेह से अत्यन्त उद्विग्न है।
 
तात्पर्य
 जब कोई शिष्य अपने गुरु से कोई संदेश प्राप्त करके उसे निष्ठापूर्वक सम्पन्न कर लेता है, तो उसे अधिकार है कि वह अपने गुरु से चाहे जिस प्रकार के अनुग्रह के लिए याचना करे। सामान्य रूप से भगवान् का शुद्ध भक्त अथवा प्रामाणिक गुरु का शुद्ध शिष्य भगवान् या गुरु से किसी अनुग्रह की याचना नहीं करता, किन्तु यदि कभी गुरु से किसी प्रकार का अनुग्रह प्राप्त करने की आवश्यकता आ पड़े तो जब तक वह उन्हें पूर्णतया प्रसन्न न कर ले तब तक उसकी याचना नहीं कर सकता। स्वायंभुव मनु अपनी पुत्री के स्नेह के कारण अपने मन की बात प्रकट करना चाह रहे थे कि वे कौन सा काम कराना चाहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥