श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक
दिव्योपकरणोपेतं सर्वकालसुखावहम् ।
पट्टिकाभि: पताकाभिर्विचित्राभिरलंकृतम् ॥ १४ ॥
स्रग्भिर्विचित्रमाल्याभिर्मञ्जुशिञ्जत्षडङ्‌घ्रिभि: ।
दुकूलक्षौमकौशेयैर्नानावस्रैर्विराजितम् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
दिव्य—विचित्र; उपकरण—सामग्री से; उपेतम्—युक्त; सर्व-काल—सभी ऋतुओं में; सुख-आवहम्—सुखदायक; पट्टिकाभि:—बंदनवारों से; पताकाभि:—पताकाओं से; विचित्राभि:—विभिन्न रंगों तथा धागों से; अलङ्कृतम्— सज्जित; स्रग्भि:—हारों से; विचित्र-माल्याभि:—आकर्षक पुष्पों से; मञ्जु—मधुर; शिञ्जत्—गुंजार करता; षट्- अङ्घ्रिभि:—भौरों से; दुकूल—महीन वस्त्र; क्षौम—लिनेन; कौशेयै:—रेशमी वस्त्र से; नाना—विविध; वस्त्रै:—पर्दों से; विराजितम्—शोभायमान ।.
 
अनुवाद
 
 यह प्रासाद (दुर्ग) सभी प्रकार की सामग्री से सुसज्जित था और यह सभी ऋतुओं में सुखदायक था। यह चारों ओर से पताकाओं, बन्दनवारों तथा नाना-विधिक रंगों की कला-कृतियों से सजाया गया था। यह आकर्षक पुष्पों के हारों से, जिससे मधुर गुंजार करते भौंरे आकृष्ट हो रहे थे तथा लिनेन, रेशमी तथा अन्य तन्तुओं से बने पर्दों से शोभायमान था।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥