श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 16

 
श्लोक
उपर्युपरि विन्यस्तनिलयेषु पृथक्पृथक् ।
क्षिप्तै: कशिपुभि: कान्तं पर्यङ्कव्यजनासनै: ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
उपरि उपरि—एक के ऊपर एक; विन्यस्त—रखे हुए; निलयेषु—मंजिलों में; पृथक् पृथक्—अलग अलग; क्षिप्तै:— व्यवस्थित; कशिपुभि:—बिस्तरे (शय्या) से; कान्तम्—कमनीय; पर्यङ्क—पलंग; व्यजन—पंखे; आसनै:—आसनों (बैठने के स्थान, सीट) सहित ।.
 
अनुवाद
 
 यह प्रासाद शय्याओं, पलंगों, पंखों तथा आसनों से युक्त सात पृथक्-पृथक् मंजिलों (तल्लों) वाला होने से अत्यन्त मनोहर लग रहा था।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से पता चलता है कि प्रासाद में कई मंजिलें थीं। उपरि उपरि विन्यस्त शब्द सूचित करते हैं कि गगनचुम्बी भवन नये ईजाद नहीं हैं। उन दिनों लाखों वर्ष पूर्व
भी कई मंजिलो के मकान बनाने का प्रचलन था। उनमें एक या दो कमरे नहीं थे वरन् अनेक खण्ड होते थे और प्रत्येक कुशन, गद्दों, कुर्सियों, गलीचों से सज्जित होते थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥