श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
ईद‍ृग्गृहं तत्पश्यन्तीं नातिप्रीतेन चेतसा ।
सर्वभूताशयाभिज्ञ: प्रावोचत्कर्दम: स्वयम् ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
ईदृक्—ऐसे; गृहम्—घर को; तत्—वह; पश्यन्तीम्—देखती हुई; न अतिप्रीतेन—अधिक प्रसन्न नहीं हुई; चेतसा— हृदय से; सर्व-भूत—प्रत्येक प्राणी के; आशय-अभिज्ञ:—हृदय को जानते हुए; प्रावोचत्—सम्बोधित किया; कर्दम:—कर्दम ने; स्वयम्—स्वयं ।.
 
अनुवाद
 
 जब उन्होंने देखा कि देवहूति इतने विशाल, ऐश्वर्ययुक्त प्रासाद (भवन) को अप्रसन्न हृदय से देख रही है, तो कर्दम मुनि को उसकी भावनाओं का पता चला, क्योंकि वे किसी के हृदय की बात जान सकते थे। अत: उन्होंने अपनी पत्नी को स्वयं ही इस प्रकार सम्बोधित किया।
 
तात्पर्य
 देवहूति ने अपने देह की परवाह किये बिना कुटी में ही दीर्घकाल बिताया था। वह धूल-धूसरित थी और उसके वस्त्र भी बहुत अच्छे न थे। कर्दम मुनि को आश्चर्य हो रहा था कि उन्होंने ऐसा प्रसाद कैसे निर्मित कर दिया और उनकी पत्नी देवहूति भी उसी तरह विस्मित थी। वह भला ऐसे प्रासाद में कैसे रहती? कर्दम मुनि को उसके आश्चर्य का पता चल गया इसीलिए वे इस प्रकार बोले।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥