श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
निमज्ज्यास्मिन् हृदे भीरु विमानमिदमारुह ।
इदं शुक्लकृतं तीर्थमाशिषां यापकं नृणाम् ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
निमज्ज्य—स्नान करके; अस्मिन्—इसमें; ह्रदे—सरोवर में; भीरु—अरे डरपोक; विमानम्—विमान में; इदम्—इस; आरुह—चढ़ जाओ; इदम्—यह; शुक्ल-कृतम्—भगवान् विष्णु द्वारा निर्मित; तीर्थम्—पवित्र सरोवर; आशिषाम्— इच्छाओं को; यापकम्—देते हुए; नृणाम्—मनुष्यों की ।.
 
अनुवाद
 
 प्रिये देवहूति, तुम इतनी भयभीत क्यों हो? पहले स्वयं भगवान् विष्णु द्वारा निर्मित बिन्दु-सरोवर में स्नान करो, जो मनुष्य की समस्त इच्छाओं को पूरा करने वाला है और तब इस विमान पर चढ़ो।
 
तात्पर्य
 आज भी तीर्थस्थानों में जाकर वहाँ जल में स्नान करने की प्रथा है। वृन्दावन में लोग यमुना नदी में स्नान करते हैं। अन्य स्थानों में भी, यथा प्रयाग में लोग गंगा नदी में स्नान करते हैं। तीर्थम् आशिषां यापकम् शब्द तीर्थस्थानों में स्नान करने से मनोवांछित फल प्राप्त होने का संकेत करते हैं। कर्दम मुनि ने अपनी पत्नी को बिन्दु-सरोवर में स्नान करने के लिए कहा जिससे वह अपना पूर्व शारीरिक सौन्दर्य तथा कान्ति प्राप्त कर सके।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥