श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
सा तद्भर्तु: समादाय वच: कुवलयेक्षणा ।
सरजं बिभ्रती वासो वेणीभूतांश्च मूर्धजान् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
सा—वह; तत्—तब; भर्तु:—अपने पति का; समादाय—स्वीकार करके; वच:—शब्द; कुवलय-ईक्षणा—कमल के समान नेत्र वाली; स-रजम्—मैली-कुचैली; बिभ्रती—पहने हुए; वास:—वस्त्र; वेणी-भूतान्—जटा तुल्य लटें; च—तथा; मूर्ध-जान्—बाल ।.
 
अनुवाद
 
 कमललोचना देवहूति ने अपने पति की आज्ञा मान ली। मैले-कुचैले वस्त्रों तथा सिर पर बालों के जटों के कारण वह आकर्षक नहीं दिख रही थी।
 
तात्पर्य
 ऐसा लगता है कि देवहूति के बाल वर्षों से सँवारे नहीं गये थे जिससे उसमें जटें पड़ गई थीं। कहने का तात्पर्य यह कि अपने पति की सेवा में व्यस्त रहने के कारण उसने अपने शारीरिक वस्त्र तथा सुख-सुविधा की तनिक परवाह नहीं की थी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥