श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 28

 
श्लोक
स्‍नानेन तां महार्हेण स्‍नापयित्वा मनस्विनीम् ।
दुकूले निर्मले नूत्ने ददुरस्यै च मानदा: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
स्नानेन—नहाने के तेल से; ताम्—उसको; महा-अर्हेण—बहूमूल्य; स्नापयित्वा—स्नान कराकर; मनस्विनीम्— सच्चरित्र पत्नी को; दुकूले—सुन्दर वस्त्र में; निर्मले—स्वच्छ; नूत्ने—नवीन; ददु:—दिया; अस्यै—उसको; च—तथा; मान-दा:—सम्मान करने वाली ।.
 
अनुवाद
 
 देवहूति के प्रति अत्यन्त सम्मान प्रदर्शित करने वाली कन्याएँ उसे बाहर लाईं और बहुमूल्य तेलों तथा उबटनों को लगाकर नहलाया और उसे महीन, निर्मल, नये वस्त्र पहनने को दिये।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥