श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
विसृज्य कामं दम्भं च द्वेषं लोभमघं मदम् ।
अप्रमत्तोद्यता नित्यं तेजीयांसमतोषयत् ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
विसृज्य—त्याग कर; कामम्—काम-वासना; दम्भम्—गर्व; च—तथा; द्वेषम्—द्वेष; लोभम्—लोभ, लालच; अघम्—पापपूर्ण कृत्य; मदम्—मद, घमण्ड; अप्रमत्ता—समझदार; उद्यता—तत्पर रहकर; नित्यम्—सदैव; तेजीयांसम्—अपने अत्यन्त शक्तिशाली पति को; अतोषयत्—प्रसन्न कर लिया ।.
 
अनुवाद
 
 बुद्धिमानी तथा तत्परता के साथ कार्य करते हुए उसने समस्त काम, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप तथा मद को त्यागकर अपने शक्तिशाली पति को प्रसन्न कर लिया।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर एक महान् पति की महान् पत्नी के कुछ गुण दिये गये हैं। कर्दम मुनि अपनी आध्यात्मिक योग्यता के कारण महान् हैं। ऐसा पति तेजीयांसम् अर्थात् परम शक्तिमान कहलाता है। भले ही पत्नी आध्यात्मिक ज्ञान में अपने पति के समान योग्य हो, किन्तु उसे इसका वृथा गर्व नहीं होना चाहिए। कभी-कभी पत्नी अत्यन्त सम्पन्न परिवार की होती है, जिस प्रकार कि सम्राट स्वायंभुव मनु की पुत्री देवहूति थी। वह अपने पितृकुल पर इतरा सकती थी, किन्तु ऐसा करना वर्जित है, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए। उसे अपने पति के प्रति विनम्र होना चाहिए और समस्त प्रकार के मिथ्या घमंड को त्याग देना चाहिए। ज्योंही पत्नी को अपने मायके पर गर्व होने लगता है त्योंही इससे पति-पत्नी के बीच मनमुटाव उत्पन्न होता है और उनका वैवाहिक जीवन चौपट हो जाता है। देवहूति इस मामले में अत्यन्त सतर्क थी इसीलिए यह कहा गया है कि उसने पूर्णतया गर्व का परित्याग कर दिया था। देवहूति कृतघ्न न थी। पत्नी का सबसे पापमय कृत्य है दूसरा पति या प्रेमी बनाना। चाणक्य पण्डित ने घर के चार शत्रु बताये हैं। यदि पिता ऋणी हो तो वह शत्रु है; यदि माता अपने वयस्क संतान के होते हुए दूसरा पति चुन ले तो वह शत्रु है; यदि पत्नी अपने पति के साथ अभद्र व्यवहार करे तो वह शत्रु है; और यदि पुत्र मूर्ख हो तो वह भी शत्रु है। पारिवारिक जीवन की सम्पत्ति पिता, माता, पत्नी तथा सन्तान हैं किन्तु यदि पत्नी या माता अपने पति या पुत्र के होते हुए दूसरा पति चुन ले तो वैदिक सभ्यता के अनुसार वह शत्रु है। साध्वी तथा आज्ञाकारी पत्नी को कभी परपुरुष-गमन नहीं करना चाहिए—यह सबसे बड़ा पाप है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥