श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
यदा सस्मार ऋषभमृषीणां दयितं पतिम् ।
तत्र चास्ते सह स्त्रीभिर्यत्रास्ते स प्रजापति: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
यदा—जब; सस्मार—स्मरण किया; ऋषभम्—अग्रगण्य; ऋषीणाम्—ऋषियों में; दयितम्—प्रिय; पतिम्—पति; तत्र—वहाँ; च—तथा; आस्ते—उपस्थित थी; सह—साथ; स्त्रीभि:—दासियों के; यत्र—जहाँ; आस्ते—उपस्थित था; स:—वह; प्रजापति:—प्रजापति (कर्दम) ।.
 
अनुवाद
 
 जब उसने ऋषियों में अग्रगण्य अपने परम प्रिय पति कर्दम मुनि का स्मरण किया, तो वह अपनी समस्त दासियों सहित वहाँ प्रकट हो गई जहाँ मुनि थे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से लगता है कि प्रारम्भ में देवहूति अपने को मैली-कुचैली समझकर बेढंगे वस्त्र धारण किये थी। जब उसके पति ने सरोवर में प्रवेश करने के लिए कहा तो उसे दासियाँ दिखीं जिन्होंने उसकी देखभाल की। यह सब जल के भीतर हुआ और ज्योंही उसने अपने प्रिय पति कर्दम मुनि का स्मरण किया, तो तुरन्त ही वह उनके समक्ष उपस्थित हो गई। ये कुछ शक्तियाँ हैं, जिन्हें सिद्ध योगी प्राप्त करते हैं। वे इच्छानुसार कुछ भी कर सकते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥