श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
तस्मिन्नलुप्तमहिमा प्रिययानुरक्तो
विद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने ।
बभ्राज उत्कचकुमुद्गणवानपीच्य-
स्ताराभिरावृत इवोडुपतिर्नभ:स्थ: ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—उसमें; अलुप्त—बिना खोये हुए; महिमा—यश; प्रियया—अपनी प्रियतमा के साथ; अनुरक्त:—लुब्ध; विद्याधरीभि:—गंधर्व कन्याओं से; उपचीर्ण—सेवित; वपु:—शरीर; विमाने—विमान में; बभ्राज—चमकता था; उत्कच—खुला; कुमुत्-गणवान्—चन्द्रमा जिससे कुमुदिनियाँ खिलती हैं; अपीच्य:—अत्यन्त आकर्षक; ताराभि:— तारागणों से; आवृत:—घिरा हुआ; इव—जिस प्रकार; उडु-पति:—चन्द्रमा (नक्षत्रों में मुख्य); नभ:-स्थ:—आकाश में ।.
 
अनुवाद
 
 अपनी प्रिया पर अत्यधिक अनुरक्त रहने तथा गंधर्व-कन्याओं द्वारा सेवित होने पर भी मुनि की महिमा कम नहीं हुई, क्योंकि उनको अपने पर नियंत्रण प्राप्त था। उस हवाई-प्रासाद में कर्दम मुनि अपनी प्रिया के साथ इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे मानो आकाश में नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा हो, जिससे रात्रि में जलाशयों में कुमुदिनियाँ खिलती हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि प्रासाद आकाश में था, अत: इस श्लोक में पूर्ण चन्द्रमा तथा नक्षत्रों से दी गई उपमा अत्यन्त सुन्दर है। कर्दम मुनि पूर्ण चन्द्रमा के समान लग रहे थे और उनकी पत्नी देवहूति के चारों ओर एकत्र कन्याएँ नक्षत्रों के समान थीं। पूर्णिमा की रात्रि में नक्षत्र तथा चन्द्रमा मिलकर सुन्दर नक्षत्र-समूह की रचना करते हैं; उसी तरह आकाश स्थित उस प्रासाद में कर्दम मुनि गंधर्व कन्याओं से घिरी अपनी सुन्दर पत्नी के साथ चन्द्रमा तथा नक्षत्रों के समान प्रतीत हो रहे थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥