श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक
भ्राजिष्णुना विमानेन कामगेन महीयसा ।
वैमानिकानत्यशेत चरँल्लोकान् यथानिल: ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
भ्राजिष्णुना—कान्तिमान; विमानेन—विमान से; काम-गेन—इच्छानुसार उडऩे वाला; महीयसा—अत्यधिक; वैमानिकान्—अपने विमान में स्थित देवतागण; अत्यशेत—आगे बढ़ गया; चरन्—यात्रा करते हुए; लोकान्—लोकों से होकर; यथा—जिस प्रकार; अनिल:—वायु ।.
 
अनुवाद
 
 वे रास्ते में विभिन्न लोकों से होकर उसी तरह यात्रा करते रहे जिस प्रकार वायु प्रत्येक दिशा में अबाध रूप से चलती रहती है। उसी महान् तथा कान्तिमान हवाई-प्रासाद में, जो उनकी इच्छानुसार उड़ सकता था, बैठकर वे देवताओं से बाजी मार ले गये।
 
तात्पर्य
 देवताओं द्वारा निवसित लोक अपनी-अपनी कक्ष्याओं तक ही सीमित रहते हैं, किन्तु कर्दम मुनि अपनी योगशक्ति से बिना रोक-टोक के ब्रह्माण्ड की किसी भी दिशा में यात्रा कर सके थे। इस ब्रह्माण्ड में रहने वाली जीवात्माएँ बद्धजीव कहलाती हैं अर्थात् वे अन्यत्र जाने के लिए स्वच्छन्द नहीं हैं। हम इस भूलोक के वासी हैं, हम अन्य लोकों में स्वच्छन्द विचरण नहीं कर सकते। आधुनिक युग में मानव अन्य लोकों (ग्रहों) में जाने का प्रयत्न कर रहा है, किन्तु अभी तक वह असफल रहा है। अन्य किसी लोक की यात्रा करना सम्भव नहीं है, क्योंकि प्राकृतिक नियमों के कारण देवता तक एक लोक से दूसरे में नहीं आ-जा सकते। किन्तु कर्दम मुनि अपनी योगशक्ति से देवताओं से भी आगे निकल गये थे और वे समस्त दिशाओं में आकाश में यात्रा कर सकते थे। यहाँ पर दी गई उपमा सटीक है। यथा अनिल: शब्द इस बात का सूचक है कि वायु बिना रोक-टोक के कहीं भी विचर सकती है, उसी तरह से कर्दम मुनि भी ब्रह्माण्ड की समस्त दिशाओं में भ्रमण कर रहे थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥