श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
किं दुरापादनं तेषां पुंसामुद्दामचेतसाम् ।
यैराश्रितस्तीर्थपदश्चरणो व्यसनात्यय: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
किम्—क्या; दुरापादनम्—प्राप्त करना कठिन, दुर्लभ; तेषाम्—उनके लिए; पुंसाम्—मनुष्यों को; उद्दाम-चेतसाम्— जो दृढ़ संकल्प हैं; यै:—जिनके द्वारा; आश्रित:—शरण ली गई है; तीर्थ-पद:—श्रीभगवान् के; चरण:—पाँव; व्यसन-अत्यय:—भव-भय को हरने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 जिन्होंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरण-कमलों की शरण प्राप्त कर ली है उन दृढ़प्रतिज्ञ मनुष्यों के लिए कौन सी वस्तु दुर्लभ है? उनके चरण तो गंगा जैसी पवित्र नदी के उद्गम हैं, जिनसे सांसारिक जीवन के समस्त अनिष्ट दूर हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ यैराश्रितस्तीर्थपदश्चरणो शब्द समूह अत्यन्त सार्थक है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तीर्थपाद कहलाते हैं। गंगा पवित्र नदी कहलाती है, क्योंकि यह भगवान विष्णु के पाँव के अँगूठे से निकली है। गंगा बद्धजीवों के समस्त भौतिक संतापों का निवारण करने के निमित्त है। अत: जिस जीवात्मा ने भगवान् के पवित्र चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली है उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। कर्दम मुनि इसलिए विशिष्ट नहीं हैं, क्योंकि वे महान् योगी थे, वरन् इसलिए कि वे महान् भक्त थे। इसलिए यहाँ पर यह कहा गया है कि कर्दम जैसे महामुनि के लिए कुछ भी असम्भव न था। यद्यपि योगीजन आश्चर्यजनक कलाएँ दिखा सकते हैं जैसाकि कर्दम ने पहले ही कर दिखाया था, किन्तु वे किसी सामान्य योगी से बढक़र थे, क्योंकि वे भगवान् के परम भक्त थे। इसलिए वे सामान्य योगी की अपेक्षा अधिक महिमांडित थे। जैसाकि भगवद्गीता में पुष्टि हुई है, “अनेक योगियों में वही सर्वश्रेष्ठ है, जो भगवान् का भक्त है।” कर्दम मुनि जैसे व्यक्ति के लिए बद्ध होने का प्रश्न ही नहीं उठता। वे पहले से ही मुक्त थे और देवताओं से भी बढक़र थे, क्योंकि वे भी बद्ध होते हैं। यद्यपि वे अपनी पत्नी तथा अन्य अनेक स्त्रियों के साथ विहार कर रहे थे, किन्तु भौतिक बद्धजीवन से ऊपर थे। इसीलिए व्यसनात्यय: शब्द प्रयुक्त हुआ है, जो यह सूचित करता है कि वे बद्धजीव की स्थिति से ऊपर थे। वे समस्त भौतिक सीमाओं से परे थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥