श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक
पतिं सा प्रव्रजिष्यन्तं तदालक्ष्योशतीबहि: ।
स्मयमाना विक्लवेन हृदयेन विदूयता ॥ ४९ ॥
 
शब्दार्थ
पतिम्—उसका पति; सा—वह; प्रव्रजिष्यन्तम्—घर छोडऩे को तत्पर; तदा—तब; आलक्ष्य—देखकर; उशती— सुन्दर; बहि:—बाहर से; स्मयमाना—हँसती हुई; विक्लवेन—विचलित, विकल; हृदयेन—हृदय से; विदूयता— संतप्त ।.
 
अनुवाद
 
 जब उसने देखा कि उसके पति गृह-त्याग करने ही वाले हैं, तो वह बाहर से हँसी, किन्तु हृदय में अत्यन्त विकल और सन्तप्त थी।
 
तात्पर्य
 कर्दम मुनि ने अपनी योगशक्ति से अपने गृहस्थी के कार्यों को जल्दी ही समाप्त कर लिया। हवा में प्रासाद खड़ा करने, अपनी पत्नी तथा गंधर्व कन्याओं के साथ समग्र ब्रह्माण्ड का भ्रमण और फिर सन्तान उत्पन्न करने के कार्य समाप्त हो चुके और अब अपने पूर्व वचनों के अनुसार उन्हें अपना घर छोडक़र आत्म-बोध की अपनी असली रुचि के लिए प्रस्थान करना था। अपने पति को प्रस्थान की स्थिति मे देखकर देवहूति मन ही मन अत्यन्त विकल थी, किन्तु ऊपर से हँस रही थी। कर्दम मुनि के उदाहरण को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए; जिस व्यक्ति की प्रमुख रुचि कृष्णभावनामृत में है, यदि वह गृहस्थ जीवन में फँस भी जाता है, तो उसे घर के आकर्षण को जितनी जल्दी हो सके त्याग देने के लिए उद्यत रहना चाहिए।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥