श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक
देवहूतिरुवाच
सर्वं तद्भगवान्मह्यमुपोवाह प्रतिश्रुतम् ।
अथापि मे प्रपन्नाया अभयं दातुमर्हसि ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
देवहूति:—देवहूति ने; उवाच—कहा; सर्वम्—सभी; तत्—वह; भगवान्—हे भगवान्; मह्यम्—मेरे लिए; उपोवाह—पूर्ण हुईं; प्रतिश्रुतम्—वचन दिया; अथ अपि—फिर भी; मे—मुझको; प्रपन्नायै—शरणागत को; अभयम्—निर्भीकता; दातुम्—देने के लिए; अर्हसि—योग्य हो ।.
 
अनुवाद
 
 देवहूति ने कहा—हे स्वामी, आपने जितने वचन दिये थे वे सब पूर्ण हुए, किन्तु मैं आपकी शरणागत हूँ इसलिए मुझे अभयदान भी दें।
 
तात्पर्य
 देवहूति ने अपने पति से प्रार्थना की कि वे उसे अभय प्रदान करें। पत्नी रूप में वह अपने पति के प्रति पूर्णतया समर्पित थी, अत: यह पति का धर्म है कि वह अपनी पत्नी को अभयदान दे। श्रीमद्भागवत के पंचम स्कंध में बताया गया है कि अपने आश्रित को किस प्रकार अभयदान दिया जाता है। जो मृत्यु के चंगुल से नहीं छूट पाता वह आश्रित है, उसे चाहिए कि वह न तो गुरु बने, न पति, न परिजन, न पिता, न माता इत्यादि। यह तो श्रेष्ठों का धर्म है कि अपने अधीनस्थ
को अभयदान दें। अत: पिता, माता, गुरु, नातेदार या पति के रूप में किसी की जिम्मेदारी लेने वाले को चाहिए कि अपने अधीनस्थ को संसार की भयावह स्थिति से छुटकारा दिलाए। भौतिक जीवन सदैव भयावह एवं चिन्ताओं से पूर्ण है। देवहूति कहती है, “आपने मुझे अपनी योगशक्ति से सभी प्रकार की भौतिक सुविधाएँ प्रदान की हैं और अब आप प्रस्थान करने वाले हैं, अत: आप अपना अन्तिम दान (वर) भी देते जाएँ जिससे मैं इस बद्धजीवन से मुक्त हो सकूँ”।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥