श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक
इन्द्रियार्थेषु सज्जन्त्या प्रसङ्गस्त्वयि मे कृत: ।
अजानन्त्या परं भावं तथाप्यस्त्वभयाय मे ॥ ५४ ॥
 
शब्दार्थ
इन्द्रिय-अर्थेषु—इन्द्रियतृप्ति हेतु; सज्जन्त्या—अनुरक्त रह कर; प्रसङ्ग:—आकर्षण; त्वयि—तुम्हारे लिए; मे—मेरे द्वारा; कृत:—किया गया था; अजानन्त्या—न जानते हुए; परम् भावम्—आपकी दिव्य स्थिति; तथा अपि—तो भी; अस्तु—होवे; अभयाय—भय दूर करने के लिए; मे—मेरा ।.
 
अनुवाद
 
 आपकी दिव्य स्थिति (पद) से परिचित न होने के कारण ही मैं इन्द्रियों के विषयों में लिप्त रह कर आपको प्यार करती रही। तो भी मैंने आपके लिए जो आकर्षण (अनुराग) उत्पन्न कर लिया है, वह मेरे समस्त भय को दूर करे।
 
तात्पर्य
 देवहूति अपनी दशा पर शोक प्रकट कर रही है। स्त्री होने के नाते वह प्रेम तो किसी से कर सकती थी। वह किसी कारणवश कर्दम मुनि से प्रेम करने लगी, किन्तु उनकी आध्यात्मिक उपलब्धि से वह अपरिचित ही रही। कर्दम मुनि देवहूति के मन की बात जान गये। सामान्यत: सभी स्त्रियाँ भौतिक सुख भोगना चाहती हैं। वे अल्पज्ञानी कही जाती हैं, क्योंकि भौतिक सुख के लिए उन्मुख रहती हैं। देवहूति को पछतावा है कि उसके पति ने सर्वश्रेष्ठ भौतिक सुख प्रदान किया, किन्तु उसे यह पता न चल पाया कि वे आत्म-बोध में इतने उठे हुए थे। उसका कहना है कि यद्यपि अपने महान् पति की महिमा को वह नहीं समझ पाई, किन्तु उनकी शरण में होने के कारण उसे भौतिक बन्धन से मुक्त होना चाहिए। महापुरुष की संगति बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। चैतन्य-चरितामृत में भगवान् चैतन्य ने कहा है कि साधु संग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भले ही कोई ज्ञान में कितना बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो, किसी महान् साधु पुरुष की संगति मात्र से वह तुरन्त आत्मजीवन में आगे बढ़ जाता है। एक स्त्री के रूप में सामान्य पत्नी बन कर देवहूति कर्दम मुनि से अपने इन्द्रिय सुख तथा अन्य सुविधाओं के लिए आसक्त थी, किन्तु वास्तव में उसे एक महान् पुरुष का सान्निध्य प्राप्त था। अब उसे इसका ज्ञान हुआ, अत: वह इस संगति का लाभ उठाना चाह रही थी।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥