श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक
सङ्गो य: संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया ।
स एव साधुषु कृतो नि:सङ्गत्वाय कल्पते ॥ ५५ ॥
 
शब्दार्थ
सङ्ग:—संगति; य:—जो; संसृते:—जन्म-मृत्यु के चक्र का; हेतु:—कारण; असत्सु—इन्द्रिय-तृप्ति में लगे रहने वालों के साथ; विहित:—किया गया; अधिया—अविद्या से; स:—वही वस्तु; एव—निश्चय ही; साधुषु—साधु पुरुषों के साथ; कृत:—किया गया; नि:सङ्गत्वाय—मुक्ति के लिए; कल्पते—ले जाता है ।.
 
अनुवाद
 
 इन्द्रियतृप्ति हेतु संगति निश्चय ही बन्धन का मार्ग है। किन्तु जब वही संगति किसी साधु पुरुष से की जाती है, तो भले ही वह अनजाने में की जाय, मुक्ति के मार्ग पर ले जाने वाली है।
 
तात्पर्य
 साधु पुरुष से चाहे जिस रूप में संगति की जाय, एक सा फल मिलता है। उदाहरणार्थ, श्रीकृष्ण अनेक जीवात्माओं से मिलते हैं—कुछ उन्हें अपना शत्रु मानते हैं और कुछ इन्द्रिय-तृप्ति के साधनरूप। सामान्यतया कहा जाता है कि गोपियाँ इन्द्रिय-सुख के लिए कृष्ण पर आसक्त थीं तो भी वे भगवान् की उत्तम कोटि की भक्त थीं। किन्तु कंस, शिशुपाल, दंतवक्र तथा अन्य असुर कृष्ण के शत्रु थे। वे चाहे भयवश शत्रु के रूप में या इन्द्रिय-सुख के लिए भक्त रूप में कृष्ण की संगति में आये, मुक्ति तो सबों की हुई। भगवान् की संगति का यही परिणाम होता है। यदि कोई यह नहीं जानता कि भगवान् कौन हैं, तो भी वही परिणाम होता है। महान् साधु पुरुष की संगति से भी मुक्ति मिलती है, जिस प्रकार कोई जान कर या अनजाने ही आग की ओर जाता है, तो उसे गर्मी प्राप्त होती है। देवहूति ने अपनी कृतज्ञता प्रकट की, क्योंकि वह कर्दम मुनि से इन्द्रियतृप्ति के लिए ही संगति कर रही थी, किन्तु चूँकि वे महापुरुष थे, अत: उसे विश्वास था कि उनके आशीर्वाद से वह मुक्त हो जाएगी।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥