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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक  3.23.56 
नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते ।
न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि स: ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
—नहीं; इह—यहाँ; यत्—जो; कर्म—कार्य; धर्माय—धार्मिक जीवन की सिद्धि के लिए; —नहीं; विरागाय— विरक्ति के लिए; कल्पते—ले जाता है; —नहीं; तीर्थ-पद—भगवान् के चरणकमलों का; सेवायै—भक्ति के लिए; जीवन्—जीवित रह कर; अपि—यद्यपि; मृत:—मरा हुआ; हि—निश्चय ही; स:—वह ।.
 
अनुवाद
 
 जिस पुरुष के कर्म से न तो धार्मिक जीवन का उत्कर्ष होता है, न जिसके धार्मिक विधि-विधानों से उसे वैराग्य प्राप्त हो पाता है और वैराग्य प्राप्त पुरुष यदि श्रीभगवान् की भक्ति को प्राप्त नहीं होता, तो उसे जीवित होते हुए भी मृत मानना चाहिए।
 
तात्पर्य
 देवहूति का कहना है कि वह अपने पति से इन्द्रियतृप्ति के लिए अनुरक्त थी जिससे भौतिक बन्धनों से मुक्ति नहीं मिल सकती, अत: उसका जीवन वृथा गया। ऐसा कोई कार्य जिसे करने से धार्मिक जीवन की प्राप्ति न हो सके, वह व्यर्थ है। स्वभाव से प्रत्येक व्यक्ति कोई न कोई कार्य करना चाहता है और जब उस कार्य के करने से धार्मिक जीवन मिल सके और फिर इससे विरक्ति और विरक्ति से भक्ति प्राप्त हो सके तो समझना चाहिए कार्य सिद्ध हुआ। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है कि जिस कार्य के करने से अन्तत: भक्ति प्राप्त नहीं होती वह भवबन्धन का कारण बनता है। यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन:। यदि कोई अपने सामान्य कार्य से प्रारम्भ करके क्रमश: भक्ति के पद को प्राप्त नहीं कर लेता, तो उसे मृतक के समान मानना चाहिए। जिस कार्य से कृष्णभक्ति का ज्ञान न हो ले, वह व्यर्थ है।
 
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