श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
अन्ये पुनर्भगवतो भ्रुव उद्विजृम्भ-
विभ्रंशितार्थरचना: किमुरुक्रमस्य ।
सिद्धासि भुङ्‌क्ष्व विभवान्निजधर्मदोहान्
दिव्यान्नरैर्दुरधिगान्नृपविक्रियाभि: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
अन्ये—अन्य; पुन:—फिर; भगवत:—भगवान् की; भ्रुव:—भुकृटी के; उद्विजृम्भ—हिलने से; विभ्रंशित—नष्ट; अर्थ-रचना:—भौतिक उपलब्धियों (भोग) के; किम्—क्या लाभ; उरुक्रमस्य—भगवान् विष्णु का; सिद्धा— सफल; असि—तुम हो; भुङ्क्ष्व—भोगो; विभवान्—भेंटें; निज-धर्म—अपनी भक्ति से; दोहान्—प्राप्त; दिव्यान्— दिव्य; नरै:—पुरुषों द्वारा; दुरधिगान्—दुर्लभ; नृप-विक्रियाभि:—राजमद से गर्वित ।.
 
अनुवाद
 
 कर्दम मुनि ने कहा—भगवान् की कृपा के अतिरिक्त अन्य भोगों से कौन सा लाभ है? सभी भौतिक उपलब्धियाँ श्रीभगवान् विष्णु के भृकुटि-चालन से ही ध्वंस हो जाने वाली हैं। तुमने अपने पति की भक्ति करके वे दिव्य भेंटें प्राप्त की हैं और उनका भोग कर रही हो जो राजमद तथा भौतिक सम्पत्ति से गर्वित मनुष्यों के लिए भी दुर्लभ हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् चैतन्य ने बतलाया है कि मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भगवत्कृपा या ईश्वर-प्रेम है। उनका कथन है—प्रेमा पुमर्थो महान्—ईश्वर का प्रेम प्राप्त करना जीवन की महान् सिद्धि है। इसी सिद्धि की संस्तुति कर्दम मुनि ने अपनी पत्नी के लिए की है। उनकी पत्नी एक सुसम्पन्न राजसी परिवार की थी। सामान्यत: जो भौतिकतावादी हैं या सम्पत्तिवान तथा ऐश्वर्यवान हैं, वे भगवान् के दिव्य प्रेम को नहीं पहचान पाते। यद्यपि देवहूति का सम्बन्ध महान् राज-कुल से था, किन्तु सौभाग्यवश वह अपने महान् पति कर्दम मुनि के अधीक्षण में थी, जिन्होंने उसे मनुष्य जीवन में प्राप्त होने वाली सर्वोत्तम भेंट—भगवत्कृपा या ईश्वर प्रेम—प्रदान की। देवहूति को यह भगवत्कृपा अपने पति की सद्भावना एवं संतोष के कारण प्राप्त हुई। उसने अपने पति की सेवा की जो एक परम भक्त एवं साधु पुरुष थे और निष्ठा, प्रेम, वात्सल्य तथा सेवा से परिपूर्ण थे। कर्दम मुनि अत्यन्त संतुष्ट हो गये। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक ईश्वर-प्रेम प्रदान किया और पत्नी से कहा कि इसका भोग करो, क्योंकि यह उसे पहले ही प्राप्त हो चुका है।

ईश्वर का प्रेम कोई सामान्य वस्तु नहीं। रूप गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु की पूजा करते थे, क्योंकि वे सबों को ईश्वर का प्रेम—कृष्णप्रेम—वितरित करते थे। रूप गोस्वामी उन्हें महावदान्य कह कर उनकी प्रशंसा करते थे, क्योंकि वे सबों को मुक्तहस्त कृष्ण-प्रेम वितरित कर रहे थे, जो ज्ञानियों को अनेक जन्मों में कठिनाई से प्राप्त होता है। कृष्णप्रेम अर्थात् कृष्णभावनामृत सर्वोच्च भेंट है, जिसे हम हर किसी को प्रदान कर सकते हैं जिससे हम प्रेम करते हैं।

इस श्लोक में आगत निज-धर्म-दोहान् शब्द महत्त्वपूर्ण है। देवहूति को कर्दम मुनि की पत्नी होने के कारण अपने पति से अमूल्य भेंट प्राप्त हुई, क्योंकि वह अपने पति के प्रति अत्यन्त निष्ठावान थी। स्त्री का सबसे बड़ा धर्म है कि अपने पति के प्रति निष्ठावान रहे। यदि सौभाग्य से पति महापुरुष हो तो जोड़ी अत्यन्त पूर्ण होती है और पति तथा पत्नी दोनों का जीवन तुरन्त परिपूर्ण हो जाता है।

 
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