श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 23: देवहूति का शोक  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
एवं ब्रुवाणमबलाखिलयोगमाया-
विद्याविचक्षणमवेक्ष्य गताधिरासीत् ।
सम्प्रश्रयप्रणयविह्वलया गिरेषद्-
व्रीडावलोकविलसद्धसिताननाह ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस प्रकार; ब्रुवाणम्—बोलते हुए; अबला—स्त्री; अखिल—सम्पूर्ण; योग-माया—दिव्य ज्ञान का; विद्या विचक्षणम्—ज्ञान में अद्वितीय; अवेक्ष्य—सुनकर; गत-आधि:—सन्तुष्ट; आसीत्—हो गई; सम्प्रश्रय—विनय के साथ; प्रणय—तथा प्रेम से; विह्वलया—विह्वल होकर; गिरा—वाणी से; ईषत्—कुछ-कुछ; व्रीडा—लज्जा, संकोच; अवलोक—चितवन से; विलसत्—चमकती; हसित—हँसती; आनना—मुख वाली; आह—बोली ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त प्रकार के दिव्य ज्ञान में अद्वितीय, अपने पति को बोलते हुए सुनकर निष्पाप देवहूति अत्यन्त प्रसन्न हुई, उसका मुख किंचित् संकोच भरी चितवन और मधुर मुस्कान से खिल उठा और वह अत्यन्त विनय एवं प्रेमवश गद्गद वाणी में (रुद्ध कण्ठ से) बोली।
 
तात्पर्य
 कहा जाता है कि यदि कोई कृष्ण भावनामृत में लगा हुआ हो और भगवान् की दिव्य प्रेम-पूर्ण सेवा कर रहा हो तो यह कहा जा सकता है कि उसने तप, धर्म, यज्ञ, योग तथा ध्यान के निमित्त संस्तुत सभी अभ्यास प्राप्त कर लिया है। देवहूति का पति दिव्य ज्ञान में इतना दक्ष था कि उसके विषय में तर्क करने की आवश्यकता नहीं रह गई, अत: जब उसने उन्हें बोलते हुए सुना तो उसे विश्वास हो गया कि वे समस्त दिव्य विद्याओं में प्रवीण हो चुके हैं। उसे अपने पति द्वारा प्रदत्त भेंट पर कोई सन्देह नहीं रहा और जब उसे यह ज्ञात हुआ कि वे उसे सर्वोच्च भेंट देने जा रहे हैं, तो वह अत्यधिक प्रसन्न हुई। वह प्रेमभाव से अभिभूत हो गई, अत: वह उत्तर न दे पाई; तब रुद्ध वाणी में उसने परम रूपवती पत्नी की भाँति निम्नलिखित शब्द कहे।
 
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