श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
निर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनि: ।
दयालु: शालिनीमाह शुक्लाभिव्याहृतं स्मरन् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय:—परम साधु मैत्रेय ने; उवाच—कहा; निर्वेद-वादिनीम्—वैराग्य से युक्त बातें करने वाली; एवम्—इस प्रकार; मनो:—स्वायंभुव मनु की; दुहितरम्—पुत्री को; मुनि:—कर्दम मुनि ने; दयालु:—दयालु; शालिनीम्—प्रशंसा की पात्र; आह—कहा; शुक्ल—भगवान् विष्णु द्वारा; अभिव्याहृतम्—कथित; स्मरन्—स्मरण करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् विष्णु के वचनों का स्मरण करते हुए कर्दम मुनि ने वैराग्यपूर्ण बातें करने वाली, स्वायंभुव मनु की प्रशंसनीय पुत्री देवहूति से इस प्रकार कहा।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥