श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
सभाजयन् विशुद्धेन चेतसा तच्चिकीर्षितम् ।
प्रहृष्यमाणैरसुभि: कर्दमं चेदमभ्यधात् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
सभाजयन्—पूजा करते हुए; विशुद्धेन—विशुद्ध; चेतसा—हृदय से; तत्—श्रीभगवान् का; चिकीर्षितम्—वांछित कार्यकलाप; प्रहृष्यमाणै:—प्रमुदित; असुभि:—इन्द्रियों से; कर्दमम्—कर्दम मुनि; च—तथा देवहूति से; इदम्—यह; अभ्यधात्—कहा ।.
 
अनुवाद
 
 अवतार रुप में भगवान के अभिप्रेत कार्यकलापों के लिए प्रमुदित इन्द्रियों तथा विशुद्ध हृदय से परमेश्वर की पूजा करके, ब्रह्माजी ने कर्दम तथा देवहूति से इस प्रकार कहा।
 
तात्पर्य
 जैसाकि भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में बताया गया है, जो मनुष्य श्रीभगवान् के दिव्य कार्यों, उनके प्राकट्य तथा अन्तर्धान होने को समझ लेता है उसे मुक्त समझना चाहिए। अत: ब्रह्मा मुक्त जीव हैं। यद्यपि वे इस विश्व के प्रभारी हैं, किन्तु वे पूर्णत: सामान्य जीवात्मा की तरह नहीं हैं। चूँकि वे अधिकांश सामान्य जीवात्माओं की मूर्खताओं से मुक्त हैं, अत: उन्हें श्रीभगवान् के प्राकट्य का ज्ञान था इसीलिए उन्होंने भगवान् के कार्यों की पूजा की और प्रसन्न मन से कर्दम मुनि की प्रशंसा की, क्योंकि उनके पुत्र कपिल के रूप में भगवान् ने अवतार ले लिया था। अत: जो मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का पिता बन सकता है, वह अवश्य ही महान् भक्त है। एक ब्राह्मण ने एक श्लोक पढ़ा जिसमें वह कहता है कि वह न तो वेद जानता है और न पुराण, न उसकी इनमें रुचि है, वह तो नन्द महाराज में प्रीति रखता है, जो श्रीकृष्ण के पिता स्वरूप प्रतीत होते हैं। वह ब्राह्मण नन्द महाराज की पूजा करना चाहता था, क्योंकि उसके आँगन में श्रीभगवान् घुटनों के बल चल रहे थे। ऐसे होते है, भक्तों के कुछ उत्तम उद्गार। यदि कोई मान्य भक्त श्रीभगवान् को पुत्र रूप में उत्पन्न करे, तो उसकी भी प्रशंसा की जानी चाहिए। इसीलिए ब्रह्मा ने न केवल भगवान् के अवतार कपिल की पूजा की वरन् उनके पिता कर्दम मुनि की भी प्रशंसा की।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥