श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
इमा दुहितर: सत्यस्तव वत्स सुमध्यमा: ।
सर्गमेतं प्रभावै: स्वैर्बृंहयिष्यन्त्यनेकधा ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
इमा:—ये; दुहितर:—पुत्रियाँ; सत्य:—साध्वी; तव—तुम्हारी; वत्स—हे पुत्र; सु-मध्यमा:—तन्वंगी, पतली कमर वाली; सर्गम्—सृष्टि; एतम्—यह; प्रभावै:—वंशों द्वारा; स्वै:—स्वत:; बृंहयिष्यन्ति—वे बढ़ावेंगी; अनेक-धा—नाना प्रकार से ।.
 
अनुवाद
 
 तब ब्रह्माजी ने कर्दम मुनि की नवों कन्याओं की प्रशंसा यह कह कर की—तुम्हारी सभी तन्वंगी कन्याएँ निस्संदेह साध्वी हैं। मुझे विश्वास है कि वे अनेक प्रकार से अपने वंशों द्वारा इस सृष्टि का वर्धन करेंगी।
 
तात्पर्य
 सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी जन संख्या में वृद्धि के लिए चिन्तित रहते ही थे और जब उन्होंने देखा कि कर्दम मुनि के पहले से नौ सुन्दर कन्याएँ हो चुकी हैं, तो उन्हें आशा बँधी कि इन कन्याओं से अनेक सन्तानें उत्पन्न होंगी, जो सृष्टि करने का कार्यभार सँभालेंगी। अत: वे उन्हें देखकर प्रसन्न थे। सुमध्यमा शब्द का अर्थ है, “सुन्दर स्त्री की उत्तम कन्या।” यदि स्त्री की कमर पतली हो तो वह अत्यन्त सुन्दरी मानी जाती है। कर्दम मुनि की समस्त कन्याएँ ऐसी ही सुन्दरी थीं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥