श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
अतस्त्वमृषिमुख्येभ्यो यथाशीलं यथारुचि ।
आत्मजा: परिदेह्यद्य विस्तृणीहि यशो भुवि ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
अत:—इसलिए; त्वम्—तुम; ऋषि-मुख्येभ्य:—प्रमुख ऋषियों को; यथा-शीलम्—स्वभावों के अनुसार; यथा रुचि—रुचि के अनुसार; आत्म-जा:—अपनी पुत्रियाँ; परिदेहि—प्रदान करो; अद्य—आज; विस्तृणीहि—प्रसार करो; यश:—यश; भुवि—ब्रह्माण्ड भर में ।.
 
अनुवाद
 
 अत: आज तुम इन पुत्रियों को उनके स्वभाव तथा उनकी रुचियों के अनुसार श्रेष्ठ मुनियों को प्रदान कर दो और इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड में अपना सुयश फैलाओ।
 
तात्पर्य
 नौ मुख्य ऋषि हैं—मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ तथा अथर्वा। ये ऋषि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं और ब्रह्मा यही चाह रहे थे कि कर्दम मुनि अपनी कन्याओं को इन्हीं ऋषियों को प्रदान कर दें। यहाँ पर प्रयुक्त दो शब्द अत्यन्त सार्थक हैं—यथाशीलम् तथा यथारुचि। कन्याओं को आँख मूँदकर ऋषियों को नहीं दे दिया जाना चाहिए, वरन् उनके शील तथा रुचि के अनुसार। पुरुष तथा स्त्री को मिलाने की यही कला है। मात्र विषयी जीवन के आधार पर स्त्री तथा पुरुष का संयोग नहीं होना चाहिए। अनेक अन्य विचारणीय बातें होती हैं, जिनमें शील तथा रुचि प्रमुख हैं। यदि उनके शील तथा रुचि पृथक् पृथक् हुए तो ऐसे युगल सदैव दुखी रहते हैं। अभी चालीस वर्ष पूर्व तक, भारतीय विवाहों में पहले वर तथा कन्या के शील तथा गुण पर विचार होता था और तब उन्हें ब्याह की अनुमति दी जाती थी। यह दोनों पक्षों के माता-पिता के निर्देशन में होता था। माता-पिता ज्योतिष के अनुसार वर तथा कन्या के शील तथा रुचि का निर्धारण करा लेते थे और जब वे मिल जाते थे तभी ब्याह होता था। अन्य विचार गौण होते थे। सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्माजी ने भी इसी पद्धति की सलाह दी, “तुम अपनी कन्याओं को शील तथा रुचि के अनुसार ऋषियों के साथ ब्याहो।”

ज्योतिष गणना के अनुसार मनुष्य को देवता या असुर की श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है। इस प्रकार पति-पत्नी का चुनाव होता था। दैव गुणवाली कन्या को दैव गुणवाले वर को प्रदान करना चाहिए। इसी प्रकार आसुरी गुणवाली कन्या को असुर गुण वाले वर को प्रदान किया जाना चाहिए। तभी वे सुखी रहेंगे। किन्तु यदि कन्या असुर गुणवाली हुई और लडक़ा दैव गुणवाला, तो यह जोड़ा बेमेल होगा, वे ऐसे ब्याह से कभी सुखी नहीं रह पाएँगे। आज के समय में लडक़ों तथा लड़कियों का विवाह उनके चरित्र तथा गुण को देखकर नहीं किया जाता, इसीलिए वे सुखी नहीं रहते और तलाक होते रहते हैं।

भागवत के बारहवें स्कंध में यह भविष्यवाणी की गई है कि इस कलियुग में कामवासना के आधार पर विवाह होंगे। जब लडक़े तथा लडक़ी की कामवासना से आनन्द लेते हैं, तो वे ब्याह करते हैं और यदि उसमें कोई कमी रह जाती है, तो वे विलग हो जाते हैं। ऐसा ब्याह कोई ब्याह नहीं, यह तो कुत्तों तथा बिल्लियों का सा नर तथा मादा का मिलन है। अत: आधुनिक युग में जो सन्तानें उत्पन्न हो रही हैं, वे सही अर्थों में मनुष्य नहीं हैं। मनुष्य को तो द्विजन्मा होना ही चाहिए। पहले बच्चे को उत्तम माता तथा पिता जन्म देते हैं और फिर गुरु तथा वेद उसे दूसरा जन्म देते हैं। पहले वाले माता-पिता उसे इस संसार में लाते हैं, तब गुरु तथा वेद उसके दूसरे माता पिता बनते हैं। वैदिक प्रथा के अनुसार विवाह सन्तानोत्पत्ति के लिए होता था और प्रत्येक पुरुष तथा स्त्री आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होते थे और सन्तान उत्पत्ति करते समय सभी बातों पर सम्यक रूप से विचार किया जाता था।

 
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