श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 28

 
श्लोक
बहुजन्मविपक्‍वेन सम्यग्योगसमाधिना ।
द्रष्टुं यतन्ते यतय: शून्यागारेषु यत्पदम् ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
बहु—अनेक; जन्म—जन्मों के बाद; विपक्वेन—पका हुआ, प्रौढ़; सम्यक्—पूर्णत:; योग-समाधिना—योग में समाधि द्वारा; द्रष्टुम्—देखने के लिए; यतन्ते—प्रयत्न करते हैं; यतय:—योगीजन; शून्य-अगारेषु—एकान्त स्थानों में; यत्—जिसके; पदम्—पाँव ।.
 
अनुवाद
 
 परिपक्व योगीजन योग समाधि में अनेक जन्म लेकर एकान्त स्थानों में रह कर श्रीभगवान् के चरणकमलों को देखने का प्रयत्न करते रहते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर योग के सम्बन्ध में कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कही गई हैं। बहुजन्म विपक्वेन शब्द का अर्थ है, “जन्म जन्मान्तरों तक प्रौढ़ योगाभ्यास।” एक अन्य शब्द है, सम्यग्-योग- समाधिना जिसका अर्थ है, “योग पद्धति का पूर्ण अभ्यास।” योग के पूर्ण अभ्यास का अर्थ है भक्तियोग और जब तक मनुष्य भक्तियोग को प्राप्त नहीं होता अथवा श्रीभगवान् की शरण में नहीं जाता, तब तक उसका योगाभ्यास पूर्ण नहीं होता। श्रीमद्भगवद्गीता में इसकी पुष्टि की गई है। बहूनाम् जन्मनाम् अन्ते—अनेक जन्मों के बाद दिव्य ज्ञान में पक्व (निष्णात्) ज्ञानी श्रीभगवान् की शरण में जाता है। कर्दम मुनि इसी कथन को दुहराते हैं। अनेकानेक वर्षों तथा अनेकानेक
जन्मों तक योगाभ्यास करने पर मनुष्य एकान्त स्थान में परमेश्वर के चरणकमलों का दर्शन कर पाता है। केवल कुछ आसन कर लेने से कोई तुरन्त सिद्ध नहीं बन जाता। परिपक्व होने के लिए उसे दीर्घकाल तक—अनेक अनेक जन्मों तक—योगाभ्यास करना पड़ता है और वह भी एकान्त स्थान में जाकर। कोई किसी नगर या सार्वजनिक पार्क में योगाभ्यास नहीं कर सकता और न यह घोषित कर सकता है कि मात्र कुछ धन का आदान प्रदान करने से वह ईश्वर बन गया है। यह बेढंगा प्रचार है। जो असली योगी हैं, वे एकान्त स्थान में जाकर अभ्यास करते हैं और अनेकानेक जन्मों के बाद तभी सफल होते हैं जब वे श्रीभगवान् की शरण ग्रहण करते हैं। यही योग की पूर्णता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥