श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 29

 
श्लोक
स एव भगवानद्य हेलनं नगणय्य न: ।
गृहेषु जातो ग्राम्याणां य: स्वानां पक्षपोषण: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
स: एव—वही; भगवान्—श्रीभगवान्; अद्य—आज; हेलनम्—उपेक्षा; न—नहीं; गणय्य—ऊँचा तथा नीचा मानकर; न:—हमारे; गृहेषु—घरों में; जात:—प्रकट हुआ; ग्राम्याणाम्—सामान्य गृहस्थों का; य:—जो; स्वानाम्—अपने भक्तों का; पक्ष-पोषण:—पक्षधर ।.
 
अनुवाद
 
 हम जैसे सामान्य गृहस्थों की उपेक्षा का ध्यान न करते हुए वही श्रीभगवान् अपने भक्तों की सहायता के लिए ही हमारे घरों में प्रकट होते हैं।
 
तात्पर्य
 श्रीभगवान् को भक्त इतने प्रिय हैं कि भले ही वे एकान्त स्थान में अनेकानेक जन्मों से अभ्यास करने में रत योगियों के समक्ष न प्रकट हों, किन्तु वे गृहस्थों के घर में प्रकट होना स्वीकार करते हैं जहाँ भक्त भौतिक योग किये बिना ही भगवान् की भक्ति में लगे रहते हैं। दूसरे शब्दों में, भक्तिमय सेवा करना इतना सरल है कि गृहस्थ भी श्रीभगवान् को अपने परिवार के सदस्य के रूप में, अपने पुत्र रूप में देख सकता है जैसाकि कर्दम मुनि को अनुभव हुआ। योगी होते हुए भी वे गृहस्थ थे, किन्तु तो भी उन्हें अपने पुत्र कपिल मुनि के रूप में श्रीभगवान् का अवतार देखने को मिला।
भक्तियोग ऐसी शक्तिमान दिव्य विधि है, जो दिव्य साक्षात्कार की अन्य सभी विधियों से श्रेष्ठ है। इसीलिए भगवान् कहते हैं कि वे न तो वैकुण्ठ में रहते हैं, न योगी के हृदय में वरन् वे वहाँ वास करते हैं जहाँ शुद्ध भक्त निरन्तर उनका जप और गुणगान करते रहते हैं। श्रीभगवान् भक्तवत्सल कहे जाते हैं, उन्हें कभी भी ज्ञानी-वत्सल या योगी-वत्सल नहीं कहा जाता। वे सदैव भक्तवत्सल इसलिए कहे जाते हैं, क्योंकि अन्य दिव्य ज्ञानियों को अपेक्षा भक्तों के प्रति उनका अधिक झुकाव रहता है। भगवद्गीता में इसकी पुष्टि हुई है कि केवल भक्त ही भगवान् को यथा रूप समझ सकते हैं। भक्त्या माम् अभिजानाति—मनुष्य मुझे केवल भक्तियोग से जान सकता है, अन्यथा नहीं। ऐसा जानना ही वास्तविक है, क्योंकि ज्ञानी लोग भगवान् के ऐश्वर्य या शारीरिक कान्ति को ही जान सकते हैं और योगी आंशिक रूप से श्रीभगवान् को प्राप्त कर पाते हैं, किन्तु भक्त को न केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का बोध होता है, वरन् उनकी प्रत्यक्ष संगति भी प्राप्त होती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥