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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  3.24.3 
धृतव्रतासि भद्रं ते दमेन नियमेन च ।
तपोद्रविणदानैश्च श्रद्धया चेश्वरं भज ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
धृत-व्रता असि—तुमने पवित्र व्रत ले रखा है; भद्रम् ते—ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे; दमेन—इन्द्रियों को वश में करके; नियमेन—धर्म के पालन से; —तथा; तप:—तपस्या; द्रविण—धन का; दानै:—दान करने से; —तथा; श्रद्धया—श्रद्धा से; —तथा; ईश्वरम्—परमेश्वर को; भज—पूजा करो ।.
 
अनुवाद
 
 तुमने पवित्र व्रत धारण किये हैं। ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे। अब तुम ईश्वर की पूजा अत्यन्त श्रद्धा, संयम, नियम, तप तथा अपने धन के दान द्वारा करो।
 
तात्पर्य
 भगवान् की कृपा प्राप्त करने अथवा आत्मिक दृष्टि से आगे बढऩे के लिए मनुष्य को चाहिए कि आगे बताई गई विधि से आत्म-संयम रखे—इन्द्रियतृप्ति पर संयम रखे तथा धार्मिक सिद्धान्तों की विधियों एवं नियमों का पालन करे। संयम एवं तपस्या तथा सम्पत्ति का त्याग किये बिना मनुष्य को भगवत्कृपा प्राप्त नहीं हो सकती। कर्दम मुनि ने अपनी पत्नी को उपदेश दिया, “तुम्हें धार्मिक नियमों का पालन करते हुए, दान देकर तपस्यापूर्वक भक्ति में तत्पर होना होगा। तभी परमेश्वर तुम पर प्रसन्न होंगे और तुम्हारे पुत्र रूप में अवतरित होंगे।”
 
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