श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
स्वीयं वाक्यमृतं कर्तुमवतीर्णोऽसि मे गृहे ।
चिकीर्षुर्भगवान् ज्ञानं भक्तानां मानवर्धन: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
स्वीयम्—निज के; वाक्यम्—शब्द; ऋतम्—सत्य; कर्तुम्—बनाने के लिए; अवतीर्ण:—अवतरित; असि—हुए हो; मे गृहे—मेरे घर में; चिकीर्षु:—विस्तार करने के लिए इच्छुक; भगवान्—श्रीभगवान्; ज्ञानम्—ज्ञान; भक्तानाम्— भक्तों का; मान—सम्मान, आदर; वर्धन:—बढ़ाने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 कर्दम मुनि ने कहा—सदैव अपने भक्तों का मानवर्धन करने वाले मेरे प्रिय भगवान्, आप अपने वचनों को पूरा करने तथा वास्तविक ज्ञान का प्रसार करने के लिए ही मेरे घर में अवतरित हुए हैं।
 
तात्पर्य
 कर्दम मुनि की योग साधना के बाद जब भगवान् उनके समक्ष प्रकट हुए तो उन्होंने वचन दिया कि वे उनके पुत्र बनेंगे। अत: अपने वचन को पूरा करने के लिए ही वे कर्दम मुनि के पुत्र रूप में अवतरित हुए। उनके प्रकट होने का अन्य कारण था चिकीर्षुर्भगवान् ज्ञानम्—ज्ञान का वितरण करना। इसीलिए वे भक्तानां मानवर्धन: कहलाते हैं अर्थात् वे भक्तों के मान को बढ़ाते हैं। सांख्य का वितरण करके वे भक्तों का मानवर्धन करेंगे, अत: सांख्य दर्शन कोरा शुष्क ज्ञान नहीं है। सांख्य दर्शन का अर्थ है भक्तियोग। यदि सांख्य भक्तियोग के हेतु नहीं था, तो भक्तों का मान किस प्रकार बढ़ा होता? भक्त ज्ञान में रुचि नहीं रखते, अत: कपिल मुनि द्वारा प्रतिपादित सांख्य मनुष्य को उनकी भक्ति में दृढ़ बनाने के निमित्त है। असली ज्ञान तथा वास्तविक मुक्ति तो श्रीभगवान् की शरण में जाना और उनकी भक्तिमय सेवा में तत्पर होना है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥