श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
परं प्रधानं पुरुषं महान्तं
कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् ।
आत्मानुभूत्यानुगतप्रपञ्चं
स्वच्छन्दशक्तिं कपिलं प्रपद्ये ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
परम्—दिव्य; प्रधानम्—परम; पुरुषम्—व्यक्ति, पुरुष; महान्तम्—जो इस भौतिक जगत का मूल है; कालम्—जो काल (समय) है; कविम्—पूर्णतया ज्ञात; त्रि-वृतम्—तीन गुण; लोक-पालम्—समस्त लोकों का पालनकर्ता; आत्म—अपने आप में; अनुभूत्य—अनुभूति शक्ति से; अनुगत—मग्न; प्रपञ्चम्—जिनका भौतिक प्राकट्य; स्व छन्द—स्वतन्त्र रीति से; शक्तिम्—जो शक्तिमान है; कपिलम्—भगवान् कपिल की; प्रपद्ये—शरण लेता हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 मैं कपिल के रूप में अवतरित होने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण लेता हूँ, जो स्वतन्त्र रूप से शक्तिमान तथा दिव्य हैं, जो परम पुरुष हैं तथा पदार्थ और काल को मिलाकर सबों के भगवान् हैं, जो त्रिगुणमय सभी ब्रह्माण्डों के पालनकर्ता हैं और प्रलय के पश्चात् भौतिक प्रपञ्चों को अपने में लीन कर लेते हैं।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर कर्दम मुनि अपने पुत्र कपिल मुनि को परम् सम्बोधित करते हुए छ: ऐश्वर्यों का उल्लेख करते हैं। ये हैं—धन, वीर्य, यश, रूप, ज्ञान तथा वैराग्य। परम् शब्द श्रीमद्भागवत के प्रारम्भ में परं सत्यम् पद में श्रीभगवान् के लिए आया है। परम् की व्याख्या उसके बाद आने वाले शब्द प्रधानम् से भी होती है, जिसका अर्थ है प्रमुख, मूल, प्रत्येक वस्तु का स्रोत— सर्वकारणकारणम्—सभी कारणों का कारण। श्रीभगवान् अरूप नहीं हैं, वे पुरुष या भोक्ता हैं। वे काल तत्व हैं और सर्वज्ञाता हैं। वे भूत, वर्तमान तथा भविष्य—सब कुछ जानने वाले हैं जैसाकि भगवद्गीता में पुष्टि की गई है। भगवान् कहते हैं, “मैं ब्रह्माण्ड के कोने-कोने की प्रत्येक वस्तु—वर्तमान, भूत तथा भविष्य—को जानता हूँ।” यह भौतिक जगत जो तीन गुणों के चक्र से गतिशील है, वह भी उन्हीं की शक्ति का ही प्रदर्शन है। परास्यशक्तिर्विविधैव श्रूयते—जो कुछ भी हम देखते हैं वह उनकी शक्तियों का फल है (श्वेताश्वतर उप. ६८)। परस्य ब्रह्मण: शक्तिस्तथेदम् अखिलं जगत्। यह विष्णुपुराण की उक्ति है। हम समझ सकते हैं कि हम जो कुछ भी देखते हैं वह तीन गुणों का योगायोग है, किन्तु वास्तव में यह भगवान् की शक्ति का फल है। लोकपालम्—वे वास्तव में समस्त जीवात्माओं के पालनकर्ता हैं। नित्यो नित्यानाम्—वे समस्त जीवात्माओं के अगुआ हैं; वे एक हैं, किन्तु अनेकानेक जीवात्माओं का पालन करने वाले हैं। ईश्वर समस्त जीवों का पालन करते हैं, किन्तु कोई भी ईश्वर का पालन नहीं कर सकता। यह उनकी स्वच्छन्द शक्ति है, वे अन्यों पर आश्रित नहीं हैं। कोई कितना ही अपने को स्वच्छन्द क्यों न कहे फिर भी अपने से बड़े किसी न किसी के अधीन रहता है। किन्तु भगवान् परम पूर्ण हैं, न तो कोई उनसे बड़ा है, न उनके समान।

चूँकि कपिलमुनि कर्दममुनि के पुत्र के रूप में प्रकट हुए, किन्तु कपिल श्रीभगवान् के अवतार थे, अत: कर्दम मुनि ने शरणागत होकर उन्हें सादर नमस्कार किया। इस श्लोक का अन्य महत्त्वपूर्ण शब्द आत्मानुभूत्यानुगत-प्रपञ्चम् है। भगवान् कपिल, राम, नृसिंह, वराह रूपों में से किसी एक में अवतरित होते हैं और इस संसार में वे जो भी रूप धारण करते हैं वह उनकी आत्मीय अन्तरंगा शक्ति का प्राकट्य होता है। ये भौतिक शक्ति के कोई रूप नहीं होते। इस संसार में प्रकट होने वाली सामान्य जीवात्माएँ भौतिक शक्ति द्वारा उत्पन्न शरीर हैं, किन्तु जब कृष्ण या उनका कोई एक विस्तार या भिन्नांश इस संसार में अवतार लेता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि वह भौतिक शरीर से युक्त है, किन्तु उसका यह शरीर भौतिक नहीं होता। वे सदैव दिव्य शरीर धारण करने वाले हैं। किन्तु मूर्ख तथा धूर्त अर्थात् मूढ़ लोग उन्हें अपने जैसा एक मानते हैं और इस प्रकार उनका उपहास करते हैं। वे न समझ सकने के कारण कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार नहीं करते। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं— अवजानन्ति मां मूढा:—“जो मूढ़ हैं, वे मेरा उपहास करते हैं।” जब ईश्वर कोई रूप धारण करते हैं, तो इसका यह अर्थ नहीं होता कि वे भौतिक शक्ति की सहायता से रूप धारण करते हैं। वे अपना आत्मरूप प्रदर्शित करते हैं, क्योंकि वे अपने आध्यात्मिक धाम (वैकुण्ठ) में वास करते हैं।

 
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