श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
स त्वयाराधित: शुक्लो वितन्वन्मामकंयश: ।
छेत्ता ते हृदयग्रन्थिमौदर्यो ब्रह्मभावन: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; त्वया—तुम्हारे द्वारा; आराधित:—पूजित होकर; शुक्ल:—श्रीभगवान्; वितन्वन्—विस्तार करते हुए; मामकम्—मेरा; यश:—यश; छेत्ता—वे काट देंगे; ते—तुम्हारे; हृदय—हृदय की; ग्रन्थिम्—गाँठ; औदर्य:—तुम्हारा पुत्र; ब्रह्म—ब्रह्मज्ञान; भावन:—शिक्षा देते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 तुम्हारे द्वारा पूजित होकर श्रीभगवान् मेरे नाम तथा यश का विस्तार करेंगे। वे तुम्हारे पुत्र बनकर तथा तुम्हें ब्रह्मज्ञान की शिक्षा देकर तुम्हारे हृदय में पड़ी गाँठ को छिन्न कर देंगे।
 
तात्पर्य
 जब भगवान् आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करने के लिए आते हैं, तो वे सामान्य रूप से किसी भक्त की सेवा से प्रसन्न होकर उसके पुत्र रूप में अवतरित होते हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सबके पिता हैं, अत: उनका कोई पिता नहीं, किन्तु अपनी अचिन्त्य शक्ति से वे किसी भक्त को अपना पिता बनाना तथा उसका वंशज बनना स्वीकार करते हैं। यहाँ पर कहा गया है कि आध्यात्मिक ज्ञान से हृदय की गाँठ का छेदन हो जाता है। पदार्थ तथा आत्मा मिथ्या अहंकार की ग्रंथि से जुड़े रहते हैं। पदार्थ तथा आत्मा को एक करके मानना ही हृदय ग्रंथि कही जाती है और समस्त बद्धजीवों में विद्यमान रहती है। ज्यों-ज्यों विषयी जीवन के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है, त्यों-त्यों यह ग्रंथि कसती जाती है। भगवान् ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को समझाया था कि यह भौतिक जगत स्त्री तथा पुरुष के मध्य आकर्षण के वातावरण के तुल्य है। यह आकर्षण हृदय में ग्रंथि का रूप धारण कर लेता है और भौतिक प्रेम के कारण यह गाँठ और अधिक कस जाती है। उदाहरण के लिए धन, समाज, मित्रता तथा प्यार के पीछे दौडऩे वाले व्यक्तियों के लिए प्रेम की यह गाँठ अत्यन्त मजबूत हो जाती है। यह हृदय ग्रंथि केवल ब्रह्मभावना से अर्थात् ऐसे उपदेश से जिससे आत्म-ज्ञान बढ़ता है—छिन्न-भिन्न होती है। इस ग्रंथि को काटने के लिए किसी भौतिक अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता नहीं पड़ती, वरन् इसके लिए प्रामाणिक आध्यात्मिक-उपदेश की आवश्यकता होती है। कर्दम मुनि ने अपनी पत्नी देवहूति को उपदेश दिया कि भगवान् उसके पुत्र के रूप में प्रकट होंगे और भौतिक स्वरूप की ग्रंथि को काटने के लिए आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करेंगे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥