श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
मात्र आध्यात्मिकीं विद्यां शमनीं सर्वकर्मणाम् ।
वितरिष्ये यया चासौ भयं चातितरिष्यति ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
मात्रे—अपनी माँ को; आध्यात्मिकीम्—आत्मजीवन का द्वार खोलने वाली; विद्याम्—ज्ञान, विद्या को; शमनीम्— समाप्त करने वाली; सर्व-कर्मणाम्—समस्त सकाम कर्मों को; वितरिष्ये—मैं प्रदान करूँगा; यया—जिससे; च— भी; असौ—वह; भयम्—डर; च—भी; अतितरिष्यति—पार कर लेगी ।.
 
अनुवाद
 
 मैं इस परम ज्ञान को, जो आत्म जीवन का द्वार खोलने वाला है, अपनी माता को भी बतलाऊँगा, जिससे वह भी समस्त सकाम कर्मों के बन्धनों को तोडक़र सिद्धि तथा आत्म दर्शन प्राप्त कर सके। इस प्रकार वह भी समस्त भौतिक भय से मुक्त हो जाएगी।
 
तात्पर्य
 गृह-त्याग के समय कर्दम मुनि अपनी सुयोग्य पत्नी देवहूति के लिए अत्यधिक चिन्तित थे, अत: योग्य पुत्र ने वचन दिया कि न केवल कर्दममुनि भव-बन्धन से मुक्त हो जाएँगे, वरन् देवहूति भी अपने पुत्र के उपदेश से मुक्त हो सकेगी। यहाँ पर एक उत्तम दृष्टान्त प्रस्तुत हुआ है—पति आत्म-साक्षात्कार के हेतु संन्यास ग्रहण करके चला जाता है और उसका प्रतिनिधि, उसका पुत्र जो उसी के समान शिक्षित है, घर पर माता के उद्धार हेतु रहता है। संन्यासी अपने साथ अपनी पत्नी को नहीं ले जा सकता, वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य अपनी पत्नी को सहायक के रूप में अपने साथ रख सकता है, परन्तु उसके साथ संभोग नहीं कर सकता, किन्तु संन्यास आश्रम में वह पत्नी को अपने साथ नहीं रख सकता। अन्यथा कर्दम जैसा व्यक्ति अवश्य ही पत्नी को साथ रखे होता और आत्म-साक्षात्कार की साधना में उसे कोई अड़चन न हुई होती।
किन्तु कर्दम मुनि ने वैदिक आदेश का पालन किया जिसके अनुसार संन्यास जीवन बिताने वाला कोई भी व्यक्ति स्त्रियों के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रख सकता। किन्तु उस पत्नी का क्या होता है, जिसे पति त्याग कर जाता है? वह पुत्र को सौंप दी जाती है और पुत्र वचन देता है कि वह उसे बन्धन से मुक्त करेगा। स्त्री संन्यास ग्रहण नहीं करती। आधुनिक युग में अनेक बनावटी तथाकथित आध्यात्मिक संस्थाएँ तथा समितियाँ स्त्रियों को भी संन्यास प्रदान करती हैं, यद्यपि वैदिक साहित्य में स्त्रियों द्वारा संन्यास ग्रहण करने का कोई उल्लेख नहीं है। अन्यथा विधान होने पर कर्दम मुनि अपनी पत्नी को साथ ले जाकर उसे भी संन्यास दिला देते। किन्तु स्त्री को तो घर पर ही रहना चाहिए। उसके जीवन की तीन अवस्थाएँ होती हैं—बालपन में पिता पर निर्भर रहना; युवावस्था में अपने पति पर आश्रित रहना और वृद्धावस्था में सयाने पुत्र, यथा कपिल पर आश्रित रहना। वृद्धावस्था में स्त्री की प्रगति उसके सयाने पुत्र पर निर्भर करती है। आदर्श पुत्र कपिल अपने पिता को आश्वासन दे रहा है कि वह अपनी माता का उद्धार करेगा जिससे उसके पिता अपनी पत्नी के प्रति निश्चिन्त होकर शान्तिपूर्वक जा सके।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥