श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 24: कर्दम मुनि का वैराग्य  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
व्रतं स आस्थितो मौनमात्मैकशरणो मुनि: ।
नि:सङ्गो व्यचरत्क्षोणीमनग्निरनिकेतन: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
व्रतम्—व्रत; स:—वह (कर्दम); आस्थित:—स्वीकृत; मौनम्—मौन; आत्म—श्रीभगवान् द्वारा; एक—नितान्त; शरण:—शरण में आया; मुनि:—मुनि; नि:सङ्ग:—बिना संगति के; व्यचरत्—भ्रमण करने लगा; क्षोणीम्—पृथ्वी पर; अनग्नि:—अग्निरहित; अनिकेतन:—आश्रमविहीन ।.
 
अनुवाद
 
 कर्दममुनि ने मौन व्रत धारण करना स्वीकार किया जिससे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का चिन्तन कर सकें और एकमात्र उन्हीं की शरण में जा सकें। बिना किसी संगी के वे संन्यासी रूप में पृथ्वी भर में भ्रमण करने लगे, अग्नि अथवा आश्रय से उनका कोई सम्बन्ध न रहा।
 
तात्पर्य
 अनग्निरनिकेतन: शब्द अत्यन्त सार्थक हैं। संन्यासी को अग्नि तथा आवासीय मकानों से पूर्णतया विरक्त होना चाहिए। गृहस्थ को अग्नि की आवश्यकता यज्ञ करने या भोजन पकाने के लिए होती है, किन्तु संन्यासी को इन दोनों कार्यों से छुट्टी मिल जाती है। कृष्णभावनामृत में लगे रहने के कारण संन्यासी को न तो भोजन पकाना पड़ता है, न ही यज्ञ करना होता है, क्योंकि वह पहले ही समस्त धार्मिक अनुष्ठान पूरा कर चुका होता है। अनिकेतन: का अर्थ है, “बिना किसी आवास के।” उसके पास अपना मकान नहीं होना चाहिए, वरन् उसे अपने भोजन तथा आवास के लिए पूर्णत: भगवान् पर आश्रित रहना चाहिए। उसे भ्रमण करना चाहिए।

मौन का अर्थ है “चुप्पी।” जब तक मनुष्य चुप (मौन) नहीं रहता तब तक वह भगवान् की लीलाओं के विषय में पूरी तरह सोच नहीं पाता। इसका यह अर्थ नहीं है कि मूर्ख होने तथा न बोल सकने के कारण मौन व्रत लिया जाता है। अपितु मनुष्य को मौन धारण करना पड़ता है, जिससे लोग उसे तंग न कर सकें। चाणक्य पंडित ने कहा है कि धूर्त जब तक बोलता नहीं अत्यन्त बुद्धिमान प्रतीत होता है। बोलना ही असली परीक्षा है। निर्गुणिया ‘स्वामी’ का तथाकथित मौन यह बताता है कि उसके पास कहने को कुछ नहीं है। वह केवल भीख माँगना चाहता है। किन्तु कर्दम मुनि ने ऐसा मौन नहीं धारण किया। वे तो अनर्गल बातों से मुक्ति पाने के लिए मौन रहे। जब मनुष्य गम्भीर बनकर अनर्गल बातें नहीं करता तो वह मुनि कहलाता है। महाराज अम्बरीष ने अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया था—जब भी वे बोलते तो भगवान् की लीलाओं के विषय में बोलते। मौन के लिए अनिवार्य है कि बकवास से बचा जाय और बोलने की शक्ति को भगवान् की लीलाओं में लगाया जाय। इस प्रकार अपना जीवन सफल बनाने के लिए मनुष्य भगवान् का जप तथा श्रवण कर सकता है। व्रतम् का अभिप्राय है—संकल्प करना जैसाकि भगवद्गीता में बताया गया है—अमानित्वम् अदम्भित्वम्—अपने सम्मान की परवाह किये बिना तथा अपने पद का गर्व किए बिना। अहिंसा का अर्थ है हिंसक न बनना। ज्ञान तथा सिद्धि प्राप्त करने की अठारह विधियाँ हैं और कर्दममुनि ने व्रत के द्वारा आत्म-साक्षात्कार के सिद्धान्तों को ग्रहण किया।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥